Margdarshan Par Kahani | मार्गदर्शन पर कहानी | राजा का घमंड 

दोस्तों आज हम आपके लिए मार्गदर्शन पर कहानी लेकर आए है। कुछ कहानियां (Margdarshan Par Kahani ‌‌)ऐसी होती है जो हमें मार्ग दिखाती है और हमें आगे बढ़ने में मदद करती है। जीवन में कई बार जब हम को आगे बढ़ने के लिए कोई रास्ता नहीं मिलता तब ऐसी कहानी बहुत काम आती है। 

 वैसे तो यह कहना उचित नहीं है कि एक कहानी किसी को  जिंदगी का रास्ता दिखा सकती है पर आप यह भी नहीं कह सकते कि कहानी से किसी को  मार्गदर्शन प्राप्त नहीं हो सकता। ऐसी अनेक कथाएं हैं जिनसे लोगों को जीवन में रास्ता और मंजिल प्राप्त हुई है। 

Margdarshan Par Kahani
Margdarshan Par Kahani मार्गदर्शन पर कहानी

 महान लोगों की कहानियां हमको हमेशा से प्रेरित करते हैं कि अच्छे कार्य करें और जीवन में आगे बढ़े और उनके पद कमलों पर चलकर अपने जीवन को भी सफल बनाएं। 

राजा का घमंड – मार्गदर्शन पर कहानी

दोस्तों यह कहानी प्राचीन काल की है एक बार एक राजा जिसको अपने दान देने पर बहुत घमंड था और वह खुद को सबसे बड़ा दानी मानता था। 

 राजा जितना दान देता उतना ही उसका प्रचार करता और वह जब भी किसी से मिलता या उसके राज्य में कोई अतिथि आता तो उसको अपने दान की बहुत बड़ी बड़ी कहानियां सुनाया करता और खुद ही यह भी घोषित कर दिया करता कि इस पृथ्वी लोक पर वही है जो सबसे बड़ा दानी है। 

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 एक बार उनके राज्य में एक महान संत आए और कुछ दिन पूरे राज्य का भ्रमण करने के बाद वह राजा से मिलने पहुंच गए। राजा ने उनको ढेर सारा दान देने की कोशिश की पर उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि वह दान में केवल अन्न ग्रहण करते हैं वह भी एक दिन का। 

राजा को यह बात सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस संसार में ऐसे भी लोग हैं जिनको मोह माया से किसी प्रकार का लोभ नहीं है और वह केवल अपनी ही धुन में रहा करते हैं। 

 राजा ने उन संत को अपने महल पर भोजन के लिए बुलाया और अपने दान की बातें फिर करने लगे। राजा की बातें सुनकर संत राजा की मनोदशा को अच्छे से भांप गए।भोजन के बाद राजा ने संत से पूछा क्या आपने कभी मुझसे बड़ा दानी देखा है। 

  संत ने मुस्कुराते हुए कहा – मैंने अनेक ऐसे लोग देखे हैं जो तुमसे बड़े दानी है।  यह बात सुनकर राजा चौक गया और संत से बोला अगर ऐसा है तो चलो मुझे भी दिखाओ। मैं भी अपने से बड़े दानी को देखना चाहता हूं और यह भी देखना चाहता हूं कि उसने दान में क्या-क्या दिया। 

  संत राजा को अपने साथ गांव की ओर ले गए। गांव में एक किसान अपनी फसल को खेत से घर ले जा रहा था। संत ने उस किसान से कहा कि मुझे अपने शिष्यों के भोजन के लिए आपकी फसल का आधा हिस्सा चाहिए क्या आप मुझे यह दान में दे सकते हो ?

 किसान ने मुस्कुराते हुए संत से कहा – आप जितना चाहो उतना ले जाइए। राजा ने अकड़ कर कहा – लगता है इस बार फसल बहुत अच्छी हुई है। 

किसान ने बड़ी विनम्रता से कहा – नहीं इस बार फसल पहले की तुलना में बहुत कम हुई है और इस फसल में मुश्किल से मेरे परिवार का गुजारा हो पाए। 

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 राजा फिर गुस्से में बोला – तो फिर तुमने यह फसल दान में देने के लिए हामी क्यों भरी ?

 किसान बोला – इस फसल से मेरे परिवार का गुजारा तो नहीं होने वाला लेकिन अगर इस फसल से संत के शिष्यों का पालन हो जाए तो इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती और मेरे परिवार का पालन पोषण करने के लिए ऊपर वाला स्वयं है, वह किसी को भूख नहीं मरने देगा। 

थोड़ा आगे चलकर संत एक फल बेचने वाले के पास राजा को ले जाते और उसे कहते हैं की जो भी कमाई आज हुई है क्या आप मुझे दे सकते हैं ? इसको मैं धार्मिक काम में लगा दूंगा और आपके सारे परिवार का कल्याण होगा।

फल वाला मुस्कुराते हुए बात मान जाता है और कहता है अगर आपको कुछ और पैसों की जरूरत है तो मैं घर जाकर ले आता हूं मेरा घर पास में ही है। 

राजा उस फल वाले से कहता है तुमको बहुत मुनाफा हो रहा है तभी तो तुम इतना मोटा पैसा दान में दे रहे हो। 

 वह फल वाला विनम्रता से कहता है – नहीं श्रीमान ऐसा कुछ भी नहीं है मैं तो बहुत घाटे में चल रहा हूं पर मुझे लगा इन संत को पैसो की बहुत आवश्यकता है इसलिए में इनको दान दे रहा हूँ। 

संत  राजा को लेकर दूसरे गांव की ओर बढ़ते हैं तभी उनको रास्ते में एक वृद्ध भिखारी मिलता है जिसके पास खाने के लिए केवल एक रोटी होती है संत उस भिखारी से कहते हैं कि मुझे भूख लगी है कुछ खाने को दो ?

 वह भिखारी अपनी आधी रोटी तोड़ कर संत को दे देता है और कहता है मेरे पास बस इतना ही है। 

आगे कि कहानी – Margdarshan Par Kahani

 संत कहते हैं पर मेरा इतने से काम नहीं चलेगा , भिखारी अपना बचा हुआ रोटी का हिस्सा भी संत को दे देता और संत से हाथ जोड़कर कहता है महाराज इससे ज्यादा मैं आपके लिए कुछ नहीं कर सकता मुझे क्षमा कीजिए। 

 महाराज भिकारी से कहते है लगता है तुमको बहुत भीख मिल रही है तभी तो तुम अपने हिस्से का खाना दान में दे रहे हो ?

  वह भिखारी राजा से कहता है – मुझे आज दो दिन में यह रोटी मिली है मैं दो  दिन से भूखा हूं। पर मुझे लगता है।आप लोगों को मुझसे ज्यादा भूख लगी है इसलिए मैंने आपको अपनी रोटी देदी। मुझे तो भूखे रहने की आदत है पर शायद आप लोगों को आदत ना हो। 

संत राजा  से कहते हैं देखा तुमने तुमसे बड़े कितने दानी है। 

 राजा आश्चर्य से कहता है पर अभी तक तो मुझे कोई बड़ा दानी नहीं  दिखाई दिया। आपने बस एक किसान दिखाया है जिसने थोड़ा सा अनाज दान दिया ,एक फल वाला दिखाया जिसने बहुत कम पैसे दिए और एक भिखारी जिसने एक रोटी दान दी , इससे ज्यादा तो मेरे सैनिक दान में दे देते है। 

संत ने मुस्कुरा कर कहा –  महाराज आप अभी मेरी बात नहीं समझ रहे हैं आप जो दान देते हैं वह दूसरों की कमाई का हिस्सा है। पर जो किसान ने दान दिया है वह अनाज उसने स्वयं उगाया और उसके पास जितना भी अनाज था उसमें से आधा हिस्सा उसने मुझे दान दिया। क्या तुमने कभी अपनी विरासत का आधा हिस्सा दान में दिया है। मार्गदर्शन पर कहानी

 वह फल वाला जिसने अपने सारे पैसे दान में देने का निर्णय किया था वह भी उसकी मेहनत की कमाई थी। क्या तुमने अपनी सारी दौलत कभी दान में दी है ?

 क्या तुमने कभी अपना सारा भोजन दान में दिया और खुद भूखे रहे। 

 संत की यह बातें सुनकर राजा का घमंड टूट गया।  राजा को वह सच्चाई दिखाई दी जो अब तक उसने नहीं देखी थी। उसको यह लगता था वही सबसे बड़ा दानी है।  पर आज संत ने जितने भी लोग उसको दिखाएं वह सब उससे बड़े दानी थे ,क्योंकि राजा ने ना कभी मेहनत की थी और ना ही कभी अपने हिस्से की सारी दौलत दान में दी थी।  पूर्वजों से जो उसको मिला और राज्य की लगान से जो कर आता था उसका एक हिस्सा राजा दान में देता था और स्वयं को सबसे बड़ा दानी समझता था। 

 शिक्षा – इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी किसी बात पर घमंड नहीं करना चाहिए। अगर हम कुछ दान दे रहे हैं या अपनी पूंजी का कुछ हिस्सा भले कार्य में लगा रहे हैं तो हमें उसका ढिंढोरा पीटकर तक को नहीं बताना चाहिए। एक पुरानी कहावत में कहा गया है असल दान वही है जो एक हाथ से देने पर दूसरे हाथ को पता ना लगे। 

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