दो मूर्तियों की कहानी: दर्द और संघर्ष सहने वाला ही बनता है महान

कहा जाता है कि जो पत्थर छेनी और हथौड़े की चोट सहने से डर जाता है, वह कभी मूर्ति नहीं बन सकता। Sangharsh par Prerak Prasang in Hindi हमें सिखाता है कि संघर्ष ही मनुष्य को पूजनीय बनाता है:


मंदिर की सीढ़ी और गर्भगृह की मूर्ति

एक मूर्तिकार जंगल से दो बड़े और सुंदर पत्थर लेकर आया। उसने पहले पत्थर पर छेनी रखी और हथौड़ा चलाया। पत्थर रोने लगा और बोला, “मुझे बहुत दर्द हो रहा है, मुझ पर दया करो और मुझे छोड़ दो!” मूर्तिकार ने दया करके उस पत्थर को एक तरफ रख दिया।

इसके बाद उसने दूसरे पत्थर पर काम शुरू किया। उसने छेनी-हथौड़े से लगातार वार किए। दूसरे पत्थर को भी असहनीय पीड़ा हुई, लेकिन उसने चुपचाप सारा दर्द सहा और कहा, “आप मुझे अपनी पसंद का रूप दीजिए, मैं हर चोट सहने को तैयार हूँ।” मूर्तिकार ने कुछ ही दिनों में उस पत्थर को भगवान की एक अत्यंत मनमोहक मूर्ति में बदल दिया।

कुछ दिनों बाद जब गांव में मंदिर बनकर तैयार हुआ, तो लोगों ने सुंदर मूर्ति को मंदिर के गर्भगृह में स्थापित कर दिया। और उस पहले पत्थर को, जिसने दर्द सहने से मना कर दिया था, मंदिर की चौखट पर सीढ़ी बना दिया गया!

अब जो भी श्रद्धालु आते, वे पहले पत्थर (सीढ़ी) पर अपने जूते-चप्पल रखकर उस पर पैर रखते और अंदर जाकर दूसरे पत्थर (मूर्ति) पर फूल चढ़ाते, दूध से अभिषेक करते और सिर झुकाकर पूजा करते!

एक रात पहले पत्थर ने मूर्ति बने पत्थर से पूछा, “भाई! हम दोनों एक ही जंगल के पत्थर थे, फिर तुम्हारी पूजा क्यों होती है और मुझ पर सब पैर रखकर जाते हैं?”

मूर्ति ने मुस्कुरा कर कहा, “क्योंकि तुमने शुरुआत में छेनी और हथौड़े का थोड़ा सा दर्द सहने से इनकार कर दिया था! मैंने उस दर्द को धैर्य से सहा, इसलिए आज मैं पूज्यनीय हूँ और तुम सीढ़ी बन गए!”

💡 कहानी से सीख (Moral of the Story):
विद्यार्थी जीवन में अनुशासन, सुबह जल्दी उठना और पढ़ाई का परिश्रम वह “छेनी-हथौड़े की चोट” है। जो छात्र आज इस दर्द को खुशी से सह लेगा, कल पूरी दुनिया उसका सम्मान करेगी। और जो आज आलस्य चुनेगा, उसे जिंदगी भर ठोकरें खानी पड़ेंगी।

Advertisement

Leave a Comment