चट्टानों से टकराई, मोड़ों से बल खाई जो,
हजारों मील का सफर हंसकर तय कर आई जो।खो दिया अपना अस्तित्व उस अथाह समंदर में,
अमृत सा सुकून पाया प्रभु के इस आलिंगन में।
अहंकार मिटाकर ही तो इंसान परमात्मा पाता है,
जैसे नदी का हर कतरा खुद समंदर बन जाता है!
चट्टानों से टकराई, मोड़ों से बल खाई जो,
हजारों मील का सफर हंसकर तय कर आई जो।खो दिया अपना अस्तित्व उस अथाह समंदर में,
अमृत सा सुकून पाया प्रभु के इस आलिंगन में।
अहंकार मिटाकर ही तो इंसान परमात्मा पाता है,
जैसे नदी का हर कतरा खुद समंदर बन जाता है!