तलवारों की धार झुकी है, इस नन्हीं सी नोक के आगे,
सन्नाटों में गूंज उठी है, सोए हुए ज़मीर को जागे।जो इतिहास मिटा न सके, वो कलम अमर कर जाती है,
अंधेरे की हर साजिश को, यह रोशनी दिखलाती है।
कलम उठा तू हे लेखक, दुनिया को नया विहान दे,
सच्चाई के हर सैनिक को, तू शब्दों का सम्मान दे!