हाथों में छाले हैं जिसके, माथे पे पसीना बहता है,
वो मजदूर ही तो है जो चुपचाप गगनचुंबी महल बनाता है।खुद रहता है टूटी झोपड़ी में, पर शहर को संवारता है,
अपने पसीने की बूंदों से तकदीर को निखारता है।
नमन है उस श्रमवीर को, जो कभी हार नहीं मानता,
अपनी मेहनत की रोटी में ही वो खुदा का नूर पहचानता!