मजदूर का पसीना और स्वाभिमान: कर्मठता पर कविता | Dignity of Labour Poem in Hindi
हाथों में छाले हैं जिसके, माथे पे पसीना बहता है, वो मजदूर ही तो है जो चुपचाप गगनचुंबी महल बनाता …
हाथों में छाले हैं जिसके, माथे पे पसीना बहता है, वो मजदूर ही तो है जो चुपचाप गगनचुंबी महल बनाता …