बुद्धि से भरा बर्तन / अकल का फल | Akal Ka Phal Akbar Birbal Story in Hindi
‘अकल का फल’ बीरबल की हाजिरजवाबी और व्यवहार कुशलता की बेहद लोकप्रिय कहानी है। पड़ोसी देश के घमंडी राजा ने अकबर को नीचा दिखाने के लिए संदेश भेजा कि हमें एक घड़ा भरकर ‘अकल’ भेजिए, वरना युद्ध के लिए तैयार रहिए। बीरबल ने मिट्टी के संकरे घड़े के अंदर एक साबुत बड़ा तरबूज/कद्दू उगाकर ऐसा ‘अकल का फल’ भेजा कि पड़ोसी राजा ने बिना लड़े ही हार मान ली।
पड़ोसी राजा का पत्र और अजीबोगरीब फरमान
मुगल सल्तनत की ख्याति जब दूर-दूर तक फैली, तो ईरान और पड़ोसी रियासतों के राजा अक्सर अकबर की परीक्षा लेने के लिए अजीब-अजीब पहेलियां भेजा करते थे।
एक दिन पड़ोसी राज्य के दूत ने अकबर के दरबार में आकर एक शाही फरमान पेश किया। उस खत में लिखा था—
“शहंशाह अकबर! हमने सुना है कि आपके पास बुद्धि और अकल के बड़े-बड़े भंडार हैं। हमारी रियासत में बुद्धि की सख्त कमी हो गई है। इसलिए मित्रता के नाते हमें तुरंत एक घड़ा भरकर ‘अकल’ (बुद्धि) भिजवाइए!
यदि आप अकल से भरा घड़ा नहीं भेज सके, तो आपको अपनी पराजय स्वीकार करनी होगी और भारी हर्जाना भरना पड़ेगा!”
खत पढ़कर अकबर का सिर चकरा गया। अकबर बोले— “भला अकल भी कोई अनाज या तेल है जो घड़े में भरकर तोली जा सके? यह तो सीधे-सीधे हमें बेइज्जत करने की चाल है!”
बीरबल की मुस्कान और दो महीने की मोहलत
जब पूरा दरबार चिंतित था, तब बीरबल ने आगे आकर कहा—
“जहाँपनाह! तनिक भी फिक्र न कीजिए। हम उस राजा को एक नहीं, बल्कि लबालब भरा हुआ अकल का घड़ा भेजेंगे! बस उस दूत से कहिए कि वह दो महीने तक हमारे शाही मेहमानखाने में आराम करे, दो महीने बाद उसे अकल का घड़ा सौंप दिया जाएगा।”
दूत को मेहमानखाने भेज दिया गया। अकबर ने पूछा— “बीरबल! तुम अकल का घड़ा कहाँ से लाओगे?” बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा— “हुजूर, अकल की खेती करनी पड़ती है, बस दो महीने इंतज़ार कीजिए।”
खेत में बीरबल की अनूठी तरकीब
बीरबल सीधे अपने बाग में पहुंचे। वहां उन्होंने कद्दू (कुम्हड़ा / तरबूज) की बेलें लगवा रखी थीं। बेलों पर अभी छोटे-छोटे कद्दू के फल फूल से निकलकर बड़े होने ही वाले थे।
बीरबल ने मिट्टी के कई सारे संकरे मुंह वाले मजबूत घड़े मंगवाए। उन्होंने उन छोटे-छोटे कद्दुओं को तोड़े बिना, बेल से लगे-लगे ही घड़े के छोटे मुंह से अंदर डाल दिया!
अब हुआ यह कि कद्दू घड़े के अंदर ही सुरक्षित रहा और बेल से उसे खाद और पानी मिलता रहा। देखते ही देखते दो महीने के अंदर वह कद्दू घड़े के अंदर बढ़ते-बढ़ते इतना बड़ा हो गया कि उसने घड़े की पूरी भीतरी जगह को ठसाठस भर लिया!
दो महीने बाद बीरबल ने उस कद्दू को डंठल से काट लिया। अब स्थिति यह थी कि घड़े का मुंह तो बहुत छोटा था, लेकिन अंदर एक विशाल, भारी कद्दू फंसा हुआ था जिसे बिना घड़ा तोड़े या बिना कद्दू को काटे बाहर निकालना नामुमकिन था!
दरबार में ‘अकल का घड़ा’ और बीरबल की शर्त
दो महीने पूरे होने पर विदेशी दूत को दरबार में बुलाया गया। बीरबल ने मखमली कपड़े से ढका हुआ वह भारी घड़ा दूत के सामने पेश किया।
दूत ने जब कपड़ा हटाया, तो देखा कि संकरे मुंह वाले घड़े के अंदर एक विशालकाय फल ठसाठस भरा हुआ है।
बीरबल ने बुलंद आवाज़ में कहा—
“दूत महोदय! यह है शुद्ध और असली ‘अकल का फल’! अपने राजा साहब से कहिएगा कि वे इस अकल के फल का स्वाद लें…
लेकिन हमारी एक बहुत कड़ी शर्त है: न तो यह कीमती घड़ा फूटना चाहिए और न ही अंदर का यह फल कटना या छिलना चाहिए! बिना घड़े को तोड़े और बिना फल को नुकसान पहुंचाए, यदि आपके राजा इसे निकाल सकें, तभी यह अकल उनके काम आएगी!”
पड़ोसी राजा की हार और बीरबल की जय-जयकार
दूत ने घड़े को उलट-पुलट कर देखा। घड़े का मुंह इतना संकरा था कि दो उंगलियां भी बमुश्किल अंदर जा रही थीं, जबकि अंदर तरबूज जैसा बड़ा कद्दू फंसा था। बिना घड़ा तोड़े उसे निकालना कुदरत के नियमों के खिलाफ था!
दूत तुरंत समझ गया कि यह अकल का ऐसा अजूबा है जिसका कोई तोड़ दुनिया में नहीं है।
जब वह घड़ा पड़ोसी राजा के दरबार में पहुंचा, तो राजा उस अजूबे को देखकर हक्का-बक्का रह गया। राजा ने तुरंत अकबर को बहुमूल्य उपहार भेजे और अपनी गलती मानते हुए लिखा—
“शहंशाह अकबर! हमें समझ आ गया कि आपके पास बीरबल जैसा जो रत्न है, उसकी बराबरी पूरी दुनिया की दौलत मिलकर भी नहीं कर सकती। हमने बिना शर्त आपकी बुद्धिमत्ता स्वीकार कर ली है!”
अकबर ने बीरबल की पीठ थपथपाई और पूरा दरबार ठहाकों और तालियों से गूंज उठा।
कहानी से सीख (Moral of the Story):
- जैसी पहेली, वैसा हल: जब कोई आपके सामने जानबूझकर बेतुकी और असंभव शर्त रखे, तो उसे उसी की भाषा में एक और चतुर पहेली से निरुत्तर कीजिए।
- प्रकृति और विज्ञान की समझ: बीरबल ने प्रकृति के सामान्य नियम (पौधे की वृद्धि) का इस्तेमाल करके एक ऐसा चमत्कारी समाधान तैयार कर दिया जिसे सबने असंभव मान लिया था।
- घमंड का सिर हमेशा नीचा: अपनी ताकत या चालाकी पर घमंड करने वाले को एक न एक दिन अपने से बड़े ज्ञानी के सामने झुकना ही पड़ता है।
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