राजा शिवि अपनी सत्यनिष्ठा और न्यायप्रियता के लिए विख्यात थे। एक दिन एक भयभीत कबूतर उनकी गोद में आकर गिरा और पीछे-पीछे एक बाज आया। बाज ने कहा, “राजन! यह कबूतर मेरा भोजन है, इसे मुझे सौंप दो।”
राजा शिवि ने कहा, “यह निर्दोष पक्षी मेरी शरण में आया है। मैं इसे नहीं दे सकता। इसके बदले तुम जितना चाहो मेरे शरीर का मांस ले लो।” बाज ने कबूतर के बराबर मांस की मांग की।
राजा ने तराजू मंगवाया। एक पलड़े पर कबूतर बैठा और दूसरे पर राजा अपनी जांघ से मांस काटकर रखने लगे। लेकिन कबूतर का पलड़ा हमेशा भारी ही रहा। अंत में राजा शिवि खुद तराजू के पलड़े पर बैठ गए! तभी बाज और कबूतर इंद्र और अग्निदेव के रूप में प्रकट हुए और राजा की महानता को नमन किया।
💡 सीख: अपने वचनों पर टिके रहना और कमजोर की रक्षा करना ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।