एक माँ का 20 साल का त्याग (आँखें नम कर देने वाली सच्ची कहानी)
फटी साड़ी और भूखे पेट कटती रातें
पार्वती देवी के पति का देहांत तब हो गया था जब उनका बेटा रोहन सिर्फ 4 साल का था। ससुराल वालों ने संपत्ति से बेदखल कर दिया। रोहन को लेकर पार्वती शहर आ गईं और एक छोटी सी झुग्गी में रहने लगीं। सुबह 4 बजे उठकर पाँच घरों में झाड़ू-पोछा और बर्तन मांजना उनका रोज़ का नियम था।
कई बार घर में सिर्फ एक रोटी बचती थी। पार्वती हँसकर कहती: “बेटा तू खा ले, मुझे भूख नहीं है, आज मेरा व्रत है।” छोटा रोहन समझ नहीं पाता था कि माँ का व्रत भगवान के लिए नहीं, बल्कि बेटे की भूख मिटाने के लिए था।
किताबों के लिए गहने और कंगन बेचे
रोहन पढ़ने में बहुत होशियार था। जब उसने मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी शुरू की, तो किताबों और कोचिंग की फीस लाखों में थी। पार्वती ने अपनी शादी का आख़िरी सहारा — अपनी माँ के दिए हुए सोने के कंगन चुपचाप सुनार की दुकान पर बेच दिए। जब रोहन ने माँ की खाली कलाई देखी, तो रो पड़ा। माँ ने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा: “बेटा, जब तू डॉक्टर का सफेद कोट पहनेगा, वही मेरे लिए दुनिया का सबसे कीमती जेवर होगा।”
सपनों की मंजिल और आंसुओं का सम्मान
रोहन ने अपनी माँ के त्याग को अपनी पूजा बना लिया। उसने दिन-रात एक करके मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और जब दीक्षांत समारोह (Convocation) में उसे गोल्ड मेडल दिया गया, तो उसने वो मेडल अपने गले से उतारकर अपनी माँ के गले में पहना दिया।
हज़ारों बड़े डॉक्टरों और अफसरों की तालियों के बीच, फटी सूती साड़ी पहने पार्वती देवी की आँखों से बहते आँसू कह रहे थे कि एक माँ का त्याग कभी खाली नहीं जाता।
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माँ के चरणों में समर्पित 3 भावुक शेर
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती,
बस एक माँ है जो मुझसे कभी खफा नहीं होती!
सारे जहाँ की दौलत भी फीकी पड़ जाती है,
जब माँ मुस्कुराकर मेरे सिर पर हाथ फेरती है!
दुआओं में मेरी वो असर कहाँ से लाऊं,
माँ के कदमों जैसी जन्नत मैं कहाँ पाऊं!
उसने सींच कर बड़ा किया है मुझे अपने खून से,
उसका एक भी कर्ज़ मैं सात जन्मों में न चुका पाऊं!
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