जंगल में अंगुलिमाल नाम का एक क्रूर डाकू रहता था जो लोगों को मारकर उनकी उंगलियों की माला पहनता था। जब महात्मा बुद्ध उस जंगल से गुजरे, तो अंगुलिमाल तलवार लेकर दौड़ा और चिल्लाया, “रुक जा संन्यासी!”
बुद्ध शांत भाव से मुस्कुराए और बोले, “मैं तो कब का रुक गया, लेकिन तू कब रुकेगा अंगुलिमाल? इस पाप और हिंसा के रास्ते पर तू कब तक दौड़ता रहेगा?”
बुद्ध के चेहरे का दिव्य तेज और निर्भय प्रेम देखकर अंगुलिमाल कांप उठा। उसने अपनी तलवार फेंक दी और रोते हुए बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा।
💡 सीख: नफरत से नफरत कभी खत्म नहीं होती; नफरत केवल और केवल प्रेम व क्षमा से ही जीती जा सकती है।