भारत रत्न डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (अवुल पकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम) का जीवन इस बात का सबसे जीवंत प्रमाण है कि विफलता वास्तव में अंत नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा किसी बड़े उद्देश्य की तैयारी होती है। बचपन में रामेश्वरम के रेलवे स्टेशन पर सुबह 4 बजे उठकर अखबार बांटने वाले बालक से लेकर भारत के 11वें राष्ट्रपति और विश्वविख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक बनने तक का उनका सफर हर भारतीय युवा के सीने में नई आग भर देता है। इस आलेख में पढ़िए देहरादून का वो ऐतिहासिक रिजेक्शन जिसने उन्हें वायुसेना पायलट से ‘मिसाइल मैन’ बना दिया।
अगर ज़िंदगी में कभी आपका कोई बहुत बड़ा सपना टूट जाए, अगर आप किसी परीक्षा या इंटरव्यू में मात्र एक अंक या एक रैंक से बाहर हो जाएं और आपको लगे कि सब कुछ खत्म हो गया है—तो एक बार डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन के उस अंधेरे पन्ने को ज़रूर पढ़ लेना चाहिए।
क्योंकि कलाम साहब भी अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना हार चुके थे। वे लड़ाकू विमान (Fighter Pilot) उड़ाना चाहते थे, लेकिन उस असफलता ने उन्हें तोड़ा नहीं, बल्कि ऐसा तराशा कि वे स्वयं उन विमानों और मिसाइलों के जनक बन गए जिन्हें आज पूरी दुनिया सलाम करती है।
एक नज़र में: रामेश्वरम से राष्ट्रपति भवन तक का सफर
| वर्ष | ऐतिहासिक पड़ाव | महत्वपूर्ण उपलब्धि व राष्ट्र सेवा |
|---|---|---|
| 15 अक्टूबर 1931 | धनुषकोडी, रामेश्वरम (तमिलनाडु) में जन्म | एक साधारण नाविक परिवार में जन्म; पिता जैनुलाब्दीन और माँ अशिअम्मा |
| 1940 का दशक | प्रारंभिक शिक्षा और समाचार पत्र वितरण | चचेरे भाई शमसुद्दीन के साथ सुबह 4 बजे अखबार बांटकर अपनी पढ़ाई का खर्च निकाला |
| 1954–1958 | मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) | एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में दाखिला; बहन जोहरा ने अपनी सोने की चूड़ियां गिरवी रखीं |
| 1958 | वायुसेना इंटरव्यू (देहरादून) में रिजेक्शन | 8 पायलट पदों की भर्ती में 9वीं रैंक आई; सपना टूटा लेकिन नए मार्ग की खोज शुरू हुई |
| 1969 | इसरो (ISRO) में नियुक्ति | भारत के प्रथम उपग्रह प्रक्षेपण यान (SLV-3) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर बने |
| 18 जुलाई 1980 | रोहिणी उपग्रह का ऐतिहासिक प्रक्षेपण | SLV-3 ने रोहिणी को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया; भारत अंतरिक्ष क्लब में शामिल |
| 1982–1990 | IGMDP (इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल प्रोग्राम) | अग्नि, पृथ्वी, आकाश, त्रिशूल और नाग मिसाइलों का सफल विकास; 'मिसाइल मैन' की उपाधि |
| 11-13 मई 1998 | पोखरण-2 परमाणु परीक्षण (ऑपरेशन शक्ति) | मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में परमाणु परीक्षण का सफल नेतृत्व; भारत परमाणु शक्ति बना |
| 2002–2007 | भारत के 11वें राष्ट्रपति (जनता के राष्ट्रपति) | राष्ट्रपति भवन को आम नागरिकों, वैज्ञानिकों और स्कूली बच्चों के लिए खोल दिया |
| 27 जुलाई 2015 | आईआईएम शिलांग में व्याख्यान देते हुए महाप्रयाण | 'क्रिएटिंग अ लिवेबल प्लेनेट अर्थ' पर छात्रों को पढ़ाते हुए अंतिम सांस ली |
प्रेरक प्रसंग: देहरादून का वो रिजेक्शन जिसने देश को मिसाइल मैन दिया
मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी करने के बाद युवा कलाम के सामने करियर के दो विकल्प आए। दोनों ही उनके आकाश में उड़ने के सपने से जुड़े थे:
- रक्षा मंत्रालय का तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय (DTDP)
- भारतीय वायुसेना (IAF)
कलाम साहब का दिली सपना हमेशा से बादलों के पार फाइटर जेट उड़ाने का था। वे साक्षात्कार के लिए देहरादून पहुंचे। वायुसेना के उस इंटरव्यू में देश भर से चयनित श्रेष्ठ प्रतिभागी शामिल थे।
शारीरिक दक्षता, मानसिक चपलता और तकनीकी ज्ञान के कड़े परीक्षणों के बाद जब अंतिम मेरिट लिस्ट घोषित की गई, तो कुल 8 रिक्तियों के लिए चयन होना था। कलाम साहब की रैंक आई—नौवीं (9th)।
वे केवल एक रैंक से अपने जीवन के सबसे बड़े सपने से बाहर हो गए थे। उस रात वे देहरादून के जंगलों और पहाड़ियों में फूट-फूट कर रोए। उन्हें लगा कि उनका इंजीनियरिंग पढ़ना, बहन का गहने बेचना, माता-पिता की तपस्या—सब व्यर्थ हो गया।
हताशा और मानसिक आघात की उस स्थिति में कलाम साहब ऋषिकेश की ओर चल पड़े। गंगा किनारे घूमते हुए उनकी भेंट स्वामी शिवानन्द से हुई। स्वामी जी ने कलाम के उदास चेहरे को देखकर उनकी व्यथा पूछी। कलाम ने अपनी असफलता और रोते हुए दिल का हाल बयां किया।
तब स्वामी शिवानन्द ने कलाम की पीठ पर हाथ रखकर जो शब्द कहे, वे कलाम साहब के जीवन का महामंत्र बन गए। स्वामी जी ने कहा:
"बेटा! इस असफलता को स्वीकार करो। तुम्हारी इस इच्छा की तीव्रता शायद ब्रह्मांड के किसी बड़े विधान से मेल नहीं खा रही थी। विफलता का अर्थ यह कतई नहीं है कि तुम अयोग्य हो। इसका अर्थ केवल इतना है कि तुम्हारा भाग्य इस सीमित उड़ान से कहीं अधिक विशाल है। ईश्वर ने तुम्हारे लिए इससे कहीं बड़ा काम तय कर रखा है। अपने भीतर के विश्वास को मत खोने दो, आगे बढ़ो!"
ऋषिकेश से कलाम साहब एक नए संकल्प के साथ दिल्ली लौटे। उन्होंने 250 रुपये महीने की तनख्वाह पर वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के रूप में काम शुरू किया।
अगर उस दिन देहरादून में कलाम साहब पायलट चुन लिए गए होते, तो शायद वे वायुसेना के एक उत्कृष्ट विंग कमांडर या एयर मार्शल बनकर रिटायर हो जाते। लेकिन उस एक रिजेक्शन ने उन्हें वह वैज्ञानिक बनाया जिसने भारत को अग्नि और पृथ्वी मिसाइलें दीं, पोखरण में परमाणु शक्ति बनाया और अंतरिक्ष में तिरंगा लहरा दिया।
प्रेरक प्रसंग 2: अखबार बांटने वाले बालक की ईमानदारी और मेहनत
द्वितीय विश्व युद्ध के समय जब रामेश्वरम में रेलगाड़ियों का ठहराव बंद हो गया था, तब धनुषकोडी और रामेश्वरम के बीच चलती ट्रेन से ही अखबारों के बंडल पटरियों के किनारे फेंक दिए जाते थे।
कलाम के चचेरे भाई शमसुद्दीन को अखबारों को इकट्ठा करने और घर-घर पहुंचाने के लिए एक फुर्तीले और जिम्मेदार लड़के की जरूरत थी। आठ साल के बालक अब्दुल कलाम ने यह ज़िम्मेदारी संभाली।
कलाम साहब प्रतिदिन सुबह 4 बजे उठते थे। वे पहले अपने गणित शिक्षक के पास ट्यूशन पढ़ने जाते थे (क्योंकि वे शिक्षक सुबह नहाकर आने वाले छात्रों को मुफ्त पढ़ाते थे)। ट्यूशन के बाद वे स्टेशन की ओर दौड़ते, पटरियों पर गिरे अखबारों के बंडल बटोरते, और रामेश्वरम के मोहल्लों में घर-घर जाकर समाचार पत्र पहुंचाते थे। इसके बाद वे स्कूल जाते थे और शाम को आकर फिर हिसाब-किताब करते थे।
कलाम साहब ने अपनी आत्मकथा 'विंग्स ऑफ फायर' (Wings of Fire) में लिखा है:
"जब मुझे अपने पहले काम के बदले पहली तनख्वाह मिली, तो मेरे हाथों में जो पसीने से भीगे सिक्के थे, उनसे मुझे अपने अस्तित्व और स्वाभिमान का पहला अहसास हुआ। आज भी जब मुझे अपने जीवन का पहला कमाया हुआ पैसा याद आता है, तो मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।"
एक बार जब रामेश्वरम के स्कूल में एक नए शिक्षक ने देखा कि एक मुस्लिम बालक पहली पंक्ति में एक ब्राह्मण बालक (रामानंद शास्त्री) के साथ बैठा है, तो उन्होंने कलाम को डांटकर अंतिम पंक्ति में भेज दिया। दोनों बालकों की आंखों में आंसू आ गए।
शाम को जब रामानंद के पिता और रामेश्वरम मंदिर के मुख्य पुजारी पक्षी लक्ष्मण शास्त्री को यह पता चला, तो उन्होंने उस शिक्षक को तुरंत बुलवाया और डांटते हुए कहा:
"मासूम बच्चों के दिमाग में सामाजिक भेदभाव और धार्मिक संकीर्णता का ज़हर मत घोलो! या तो बच्चों से माफी मांगो या स्कूल छोड़कर चले जाओ।"
उस शिक्षक ने अपनी गलती मानी। कलाम साहब अक्सर कहते थे कि बचपन में मिले इस संस्कार ने उन्हें यह सिखाया कि सच्चा धर्म दिलों को जोड़ता है, बांटता नहीं।
विशेष भाग: डॉ. कलाम के जीवन से सीखने वाली 10 बातें
- सपने वो नहीं जो सोते हुए देखें: कलाम साहब का अमर सूत्र—"सपने वो नहीं होते जो हम सोते हुए देखते हैं, सपने वो होते हैं जो हमें सोने ही नहीं देते।"
- विफलता की पूरी ज़िम्मेदारी खुद लेना: जब 1979 में SLV-3 मिशन पहली बार बंगाल की खाड़ी में गिरकर असफल हुआ, तो सतीश धवन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुद ज़िम्मेदारी ली। और जब 1980 में सफल हुआ, तो कलाम को आगे कर दिया। एक सच्चे लीडर का यह गुण कलाम ने आत्मसात किया।
- सादगी और अनासक्ति: राष्ट्रपति पद से हटने के बाद जब वे राष्ट्रपति भवन से विदा हुए, तो उनके पास केवल दो सूटकेस, कुछ जोड़ी कपड़े और 2500 किताबें थीं। कोई निजी संपत्ति नहीं।
- अंतिम सांस तक कर्मठता: 83 वर्ष की आयु में भी वे छात्रों को पढ़ाने के लिए शिलांग गए और मंच पर ही अंतिम सांस ली।
- समय की पाबंदी: कलाम साहब किसी भी कार्यक्रम में निर्धारित समय से 5 मिनट पहले पहुंचते थे।
- अहंकार का शून्य होना: राष्ट्रपति रहते हुए भी वे अपने पुराने मोची और ढाबे वाले दोस्त को राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित कर भोजन कराते थे।
- वैज्ञानिक सोच और मानवीय संवेदना का संगम: वे रूद्रवीणा बजाते थे, थिरुक्कुरल और गीता के श्लोक पढ़ते थे और क़ुरआन की आयतों का सम्मान करते थे।
- युवाओं और बच्चों पर अटूट विश्वास: उनका मानना था कि 21वीं सदी का भारत युवा शक्ति के दम पर ही महाशक्ति बन सकता है।
- कठिन परिस्थितियों में शिकायत न करना: जीवन भर कम संसाधनों में बड़े परिणाम देने की आदत (Frugal Engineering) विकसित की।
- कृतज्ञता का भाव: जिन्होंने भी उनके जीवन में योगदान दिया—चाहे बहन जोहरा हों, शिक्षक शिवसुब्रमण्यम अय्यर हों या सतीश धवन—वे उनका आभार व्यक्त करना कभी नहीं भूले।
डॉ. कलाम के 5 शक्तिशाली विचार (Quotes)
"सूरज की तरह चमकना चाहते हो, तो पहले सूरज की तरह जलना सीखो।"
"इंतजार करने वालों को सिर्फ उतना ही मिलता है, जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं।"
"अगर आप अपने भविष्य को नहीं बदल सकते, तो अपनी आदतों को बदलिए। और निश्चित रूप से आपकी आदतें आपके भविष्य को बदल देंगी।"
"कठिनाइयां मनुष्य के जीवन में इसलिए आती हैं ताकि वह अपनी सफलता का सच्चा आनंद ले सके।"
"उत्कृष्टता कोई संयोग नहीं है; यह निरंतर किए गए अथक प्रयासों का परिणाम है।"
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न 1: डॉ. कलाम को 'मिसाइल मैन' क्यों कहा जाता है?
उत्तर: डॉ. कलाम ने भारत के 'इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम' (IGMDP) का नेतृत्व किया था। उनके नेतृत्व में भारत ने स्वदेशी तकनीक से सतह-से-सतह पर मार करने वाली 'पृथ्वी' और मध्यम दूरी की 'अग्नि' मिसाइलें विकसित कीं, जिसने भारत को वैश्विक स्तर पर सैन्य महाशक्ति बनाया। इसी ऐतिहासिक योगदान के कारण उन्हें 'मिसाइल मैन ऑफ इंडिया' कहा जाता है।
प्रश्न 2: डॉ. कलाम का सबसे पसंदीदा काम क्या था?
उत्तर: डॉ. कलाम हमेशा कहते थे कि वे स्वयं को सबसे पहले एक शिक्षक मानते हैं। उन्हें देश के युवाओं और स्कूली बच्चों से संवाद करना और उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करना दुनिया का सबसे संतोषजनक कार्य लगता था।
प्रश्न 3: डॉ. कलाम को भारत रत्न कब मिला था?
उत्तर: डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को विज्ञान, अनुसंधान और रक्षा क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए वर्ष 1997 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था।