Swami Vivekananda Ki Kahani

Swami Vivekananda Ki Kahani: उनका जीवन हमेशा हमें प्रेरित करता है और हमारे जीवन के हर पहलुवार में एक महत्वपूर्ण सीख छोड़ता है। उनके विचार और उपदेश हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं में मार्गदर्शन करते हैं, ताकि हम जीवन के विपरीत स्थितियों में सही निर्णय ले सकें। स्वामी विवेकानंद की यह अमूल्य कहानी हमें एक ऊँचे आदर्श और सकारात्मक जीवन की ओर प्रवृत्ति करने के लिए प्रेरित करती है।

Swami Vivekananda Ki Kahani

Swami Vivekananda Ki Kahani – I

एक बार स्वामी विवेकानंद अपने कुछ शिष्यों के साथ एक यात्रा पर थे। वे एक छोटे से गाँव में पहुँचे, जहाँ वे कुछ समय के लिए रुकने का फैसला किया। गाँव के लोग उन्हें देखकर बहुत खुश हुए। उन्होंने स्वामी विवेकानंद को अपने घरों में बुलाया और उन्हें भोजन और आवास दिया।

एक दिन, स्वामी विवेकानंद गाँव के चारों ओर घूमने गए। उन्हें एक गरीब परिवार के बच्चे दिखाई दिए, जो भूख से रो रहे थे। स्वामी विवेकानंद ने बच्चे को खाना दिया और उसके साथ बातें कीं। बच्चे ने बताया कि उसके माता-पिता गरीब हैं और उन्हें खाने के लिए पैसे नहीं मिलते हैं।

स्वामी विवेकानंद ने बच्चे की बात सुनकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया और कहा, “हम इस बच्चे की मदद करनी चाहिए।”

स्वामी विवेकानंद और उनके शिष्यों ने गाँव के लोगों के साथ मिलकर बच्चे के लिए एक स्कूल और एक भोजनालय बनाया। स्कूल में बच्चे पढ़ने और लिखने सीखते थे। भोजनालय में उन्हें मुफ्त में खाना मिलता था।

गाँव के लोग स्वामी विवेकानंद और उनके शिष्यों की मदद से बहुत खुश हुए। उन्होंने कहा, “आपने हमारे बच्चों के जीवन को बदल दिया है।”

स्वामी विवेकानंद ने कहा, “मैंने कुछ नहीं किया। मैंने बस भगवान की इच्छा को पूरा किया। भगवान सभी के साथ दया और करुणा रखते हैं। हम सभी को भी ऐसा ही करना चाहिए।”

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Swami Vivekananda Ki Kahani – II

एक बार स्वामी जी एक ब्रिज पर चल रहे थे। तभी वहां पर कुछ बंदर उनके पीछे पड़ जाते हैं। कोई बंदर उन पर लपक रहा, कोई उनका प्रसाद छीनने की कोशिश कर रहा और स्वामी जी उन बंदरों से पीछा छुड़ाने के लिए वहां से भागने लगे। स्वामी जी भागे जा रहे थे और बंदर भी उनके पीछे पीछे भागने लगे। तभी एक आदमी ने स्वामी जी से कहा कि तुम डरो मत, इनका सामना करो।

तुम जितना ज्यादा इनसे डरो, ये तुम्हें उतना ही ज्यादा डराएंगे। तभी स्वामी जी पीछे मुड़ते हैं और आंखें निकालकर उन बंदरों पर जोर से चीखते और तभी सारे बंदर वहां से दुम दबाकर भाग जाते हैं और उन्हीं बंदरों की तरह होते हैं हमारे नेगेटिव थॉट्स, जिनसे हम डरते हैं और जितना ज्यादा हम इनसे डरेंगे, हमें उतना ही ज्यादा डराएंगे। इसलिए नेगेटिव थॉट्स और डर से डरो मत, बल्कि उनका सामना करो। इनसे तुम जितना ज्यादा डर होगे, ये तुम्हें उतना ही ज्यादा डराएंगे। और अगर तुम इनका सामना करते हो तो नेगेटिव थॉट्स और डर भी एक दिन तुमसे डर जाएगा।

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Swami Vivekananda Ki Kahani – III

एक बार स्वामीजी उनके गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के साथ कहीं जा रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें एक आदमी मिला। जो पत्थर पर कुछ बना रहा था। तभी रामकृष्ण परमहंस जी ने पूछा कि तुम इस पर क्या बना रहे हो? तभी उस व्यक्ति ने जवाब दिया कि मैं एक राजा की मूर्ति बना रहा हूं।

रामकृष्ण जी ने पूछा कि क्या उस राजा की तुम्हारे पास में कोई तस्वीर है? तब उस मूर्तिकार ने कहा कि नहीं मेरे पास उनकी कोई तस्वीर नहीं है। तभी रामकृष्ण जी बोले कि अगर तुम्हारे पास उनकी कोई तस्वीर नहीं है तो फिर तुम उनकी मूर्ति कैसे बना सकते हो? तभी उस मूर्तिकार ने जवाब दिया कि भले मेरे पास उनकी कोई तस्वीर नहीं है लेकिन मेरे दिमाग में उनकी स्पष्ट तस्वीर छपी हुई है।

कुछ देर बाद उस मूर्तिकार ने राजा की सुंदर मूर्ति बनाई थी और स्वामी जी यह सारा दृश्य अपनी आंखों से साफ देख रहे थे और तभी उन्हें अपने कुछ सवालों का जवाब मिल गया कि अगर कोई भी इंसान अपनी जिंदगी में कुछ भी पाना चाहता है तो उस मुकाम की या फिर उस चीज की तस्वीर उसके माइंड में एकदम क्लियर होना चाहिए। 

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Swami Vivekananda Ki Kahani – IV

एक बार स्वामीजी को नदी पार करना था और वो नदी के पास में खड़े थे। तभी एक साधु ने आकर उनसे पूछा, क्या आप ही स्वामी विवेकानंद हो? स्वामीजी ने जवाब दिया कि जी हां, मैं ही स्वामी विवेकानंद हूं। तभी साधु ने पूछा कि स्वामीजी आप यहां पर क्या कर रहे हो। स्वामीजी ने कहा कि मुझे नदी पार करना है और मैं नाव का इंतजार कर रहा हूं। तभी साधु ने कहा कि तुम इतने बड़े इंसान हो।

कई सारे लोग तुम्हें अपनी प्रेरणा का स्त्रोत मानते हैं और तुम एक नदी पार नहीं कर सकते। देखो मैं तुम्हें नदी पार करके बताता हूं। तभी उस साधु ने पानी पर चल करके उस नदी को पार किया और फिर से पानी पर चल करके स्वामीजी के पास लौटकर आए और बोले कि देखो मेरे पास इतनी शक्ति है, मेरे पास इतना टैलेंट है, मेरे पास इतना ज्ञान है। उसके बावजूद भी मुझे कोई नहीं जानता और तुम्हारे पास कोई ज्ञान नहीं , कोई शक्तियां नहीं। उसके बावजूद भी तुम्हें सब जानते हैं। तभी स्वामी जी मुस्कुराए और साधु से पूछा कि तुम्हें यह विद्या सीखने में कितना टाइम लगा।

साधु ने कहा कि 15 साल। इतने में स्वामीजी की नाव आ गई और स्वामीजी ने साधु को नाव में बिठाया और वहां से चल दिए। दोनों ने नाव में बैठकर नदी पार की और पार करने के बाद स्वामीजी ने अपनी जेब से ₹1 बाहर निकाला और उस नाव वाले को दे दिया। यानी कि दोनों को मिलाकर 50 ₹0.50 यानी ₹1 उन्हें दे दिया। तभी स्वामीजी ने साधु से कहा कि जो काम तुम ₹0.50 में कर सकते थे, उसके लिए तुमने अपनी जिंदगी के 15 साल बर्बाद कर दिए और अगर यही 15 साल तुम समाज की भलाई में लगाते तो आज तुम्हें भी पूरी दुनिया जानती और मैंने यही किया।

इसलिए मुझे पूरी दुनिया जानती है और तुम्हें कोई नहीं जानता। और स्वामीजी ने साधु से कहा कि तुम्हारी तरह कई सारे लोग ऐसी चीजों में अपने दिन, हफ्ते, महीने, साल लगा देते हैं जिनका उनकी जिंदगी में कोई मतलब नहीं निकलता। इसलिए अपने टाइम को ऐसी जगह पर लगाओ जहां पर उसका एक्चुअल में कोई सेंस निकले। क्योंकि टाइम से बढ़कर दुनिया में कोई भी इंपोर्टेंट चीज नहीं है। अगर समय बर्बाद तो जिंदगी बर्बाद। 

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स्वामी विवेकानंद – महान आध्यात्मिक गुरु

स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद भारत के एक महान आध्यात्मिक गुरु और समाज सुधारक थे। वे रामकृष्ण परमहंस के प्रमुख शिष्य थे और उनके द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन के संस्थापक थे।

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में हुआ था। उनका बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था। वे एक कुलीन कायस्थ परिवार में पैदा हुए थे। उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे।

नरेंद्रनाथ बचपन से ही एक बुद्धिमान और तेजस्वी छात्र थे। उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। कॉलेज के दौरान उन्हें रामकृष्ण परमहंस से मिलने का अवसर मिला। रामकृष्ण परमहंस एक महान संत थे, जिन्होंने नरेंद्रनाथ के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया।

नरेंद्रनाथ ने 1884 में संन्यास ले लिया और स्वामी विवेकानंद नाम धारण कर लिया। उन्होंने रामकृष्ण परमहंस के आध्यात्मिक सिद्धांतों को पूरे विश्व में फैलाने का संकल्प लिया।

स्वामी विवेकानंद ने 1893 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनकी इस महासभा में दी गई भाषण ने पूरे विश्व को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने अपने भाषण में कहा, “मेरा मानना ​​है कि सभी धर्म एक हैं। सभी धर्मों का उद्देश्य एक ही है, और वह है आत्मज्ञान प्राप्त करना।”

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में भारत और विदेशों में कई यात्राएँ कीं। उन्होंने अपने भाषण और लेखों के माध्यम से भारतीय संस्कृति और धर्म का प्रचार किया। उन्होंने भारतीयों को अपने देश और संस्कृति पर गर्व करने के लिए प्रेरित किया।

स्वामी विवेकानंद 4 जुलाई, 1902 को बेलूर मठ में 39 वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हो गए। वे भारतीय इतिहास के सबसे महान आध्यात्मिक गुरुओं में से एक हैं।

स्वामी विवेकानंद की उपलब्धियों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • भारतीय संस्कृति और धर्म का प्रचार किया।
  • भारतीयों को अपने देश और संस्कृति पर गर्व करने के लिए प्रेरित किया।
  • विश्व धर्म महासभा में भारत का प्रतिनिधित्व किया और अपने भाषण से पूरे विश्व को प्रभावित किया।
  • रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो एक प्रमुख सामाजिक और धार्मिक संगठन है।

स्वामी विवेकानंद एक प्रेरणा हैं और उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं।

समापन

Swami Vivekananda Ki Kahani न केवल उनके जीवन के महत्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन करती है, बल्कि हमें एक उदाहरण भी प्रदान करती है कि कैसे सही मार्गदर्शन और सत्य के प्रति समर्पण से जीवन को सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचाया जा सकता है। उनकी शिक्षाएं हमें साहस, समर्पण, और सामरिक सेवा की महत्वपूर्णता का आदान-प्रदान सिखाती हैं। Swami Vivekananda Ki Kahani से हम यह सीखते हैं कि सही मार्ग पर चलकर ही हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं और अपने जीवन को एक उदाहरणीय और प्रेरणादायक दिशा में मोड़ सकते हैं।

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