Jungle Me Mahamari – Best Moral Story for Kids

यह हिंदी कहानी एक अद्वितीय जंगल की है, जहां पक्षियों की एक अनूठी संगठना है। सोनू नामक एक तोता और मंगरू बंदर की दोस्ती और साथीपन में बदलती है, जब एक भयंकर महामारी जंगल को आघात पहुंचाती है। इस कहानी में दोस्ती, बलिदान, और जंगली प्राणियों के बीच सहयोग का संदेश है। इस कहानी (Jungle Me Mahamari) से हमें सीखने को मिलता है कि कैसे मुश्किल समय में एक दूसरे का साथ देना हमें आपसी समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

Jungle Me Mahamari - Best Moral Story for Kids

Jungle Me Mahamari

मध्यप्रदेश के जंगल में बहुत से पक्षी रहते थे। उनमें कौवे, कबूतर, तोते, मैना, कोयल, और बुलबुल इत्यादि पक्षियों का समावेश था। उन सभी पक्षियों में कौवों की संख्या सबसे ज्यादा थी। सारे पक्षी मिलजुल कर रहते थे। एक दिन एक तोता जिसका नाम सोनू था, वह घर से बाहर निकलते ही अपने मुंह से चीख निकाला। “ओह! ये सब क्या हो गया? इन्हें किसने मारा?” आसपास बहुत सारे कौवे और कबूतरों की लाशें पड़ी थीं। सोनू का मन दुख से भर गया। उसके सामने उसके कई दोस्त छन्नू, बल्लू, भूरा और कन्नू मृत पड़े थे। कल तक वह जिनके साथ खेलता था, आज वह सब दुनिया छोड़ गए थे।

Jungle Me Mahamari - Best Moral Story for Kids

चारों तरफ मौत का सन्नाटा फैला था। सोनू ने पेड़ के दूसरे घरों की तरफ नजर डाली तो वहां खाली देखकर उसका दिल भार गया। सभी पंछी कहीं नहीं दिख रहे थे। सोनू ने दूर में बंदर काका को भागते हुए देखा। वे सभी सावधानी से वहां से हटने का संकेत कर रहे थे। चलो सभी भागो, बहुत बड़ी मुसीबत आ रही है।”

“महामारी की बीमारी आ गई है। अपनी जान बचानी है तो इस जंगल को छोड़कर दूर चले जाओ। सोनू, चलो, भागो, यहां से।

मंगरू काका की बात सुनकर सोनू उनके साथ साथ ऊपर उड़ने लगा। उसने आज तक ऐसी परिस्थिति का सामना नहीं किया था। जान बचाने के लिए वहां से हटने के सिवा दूसरा रास्ता भी नहीं था। मंगरू बंदर नीचे नीचे भाग रहे थे और उनके ऊपर सोनू तोता उड़ रहा था।

वह उस जंगल से बहुत दूर एक पहाड़ के पास पहुंच चुके थे। पास में एक नदी बह रही थी। मंगरू बंदर ने चारों तरफ देखा और उस जगह को ज्यादा सुरक्षित मानकर वहीं अपने कदम रोक लिए। सोनू भी उड़ता हुआ नीचे उतर आया। काका की सही जगह लग रही है। हां। इसलिए मैं यहां रुक गया हूं। पास में नदी का पानी भी है। फलों के पेड़ भी है।”

काका हमारे बहुत साथी हमेशा के लिए दुनिया छोड़ गए। बड़ा दुख हो रहा है। यह कैसी बीमारी है? बड़ी भयानक बीमारी है बेटा। एक से दूसरे में फैलने पर देरी नहीं लगती। मेरे दो बंदर साथी भी उसके चपेट में आ गए। मुझे भी अपनी जन्मभूमि प्यारी थी। लेकिन जान बचाना जरूरी है। जान है तो जहान है।

अरे सोनू, तुम तो सवेरे उठे और कुछ खाया भी नहीं होगा। हाँ। मुझे भूख तो लगी है, लेकिन उस भयानक दृश्य को देखकर मैंने सबकुछ भूल गया। काका बहुत थक गए होंगे। बैठिए ना। मैं सामने के पेड़ से पके हुए अमरूद तोड़कर गिराता हूँ। दोनों खाएँगे। सोनू उड़ गया और कुछ ही देर में देखते देखते उसकी चोंच की फुर्ती से कई अमरूद इकट्ठा हो गए।

दोनों ने अमरूद खाए और वहीं बैठ गए। दोनों आपस में बातें कर ही रहे थे कि अचानक सोनू की नजर आने वाले एक बाघ के ऊपर पड़ गई। मंगरू काका के पीठ के पीछे से वह आ रहा था, इसलिए उन्होंने उसे नहीं देखा। सोनू ने तुरंत काका को सतर्क किया। मंगरू बंदर झट से पेड़ पर चढ़ गया। सोनू तोता भी उड़कर डाल पर बैठ गया। बाघ उन्हें देखता ही रहा।

सोनू और मंगरू ने देखा कि उनकी आंखों के सामने एक कबूतर पेड़ पर से नीचे गिर गया और उसकी गर्दन एंठने लगी। बाघ उसे देख ही रहा था, लेकिन उसके पास नहीं आ रहा था। वह धीरे धीरे पीछे जाने लगा। अरे काका, यह बाग तो एक कबूतर से डर गया। पीछे ही हटा जा रहा है।

अरे बांगड़ू, वह कबूतर से नहीं, उसकी बीमारी से डर रहा है। महामारी यहां तक भी आ गई है। इसी वजह से कबूतर की जान पर खतरा आ गया है। अब हमारा यहां रहना खतरे से खाली नहीं है। खजूर से गिरे तो बबूल में अटके। चलो, यहां से अब भाग चलने में ही भलाई है।

मंगरू बंदर और सोनू वहां से आगे की ओर बढ़ गए। वह दोनों नदी के किनारे के किनारे बहुत दूर तक चले गए। वहां उन्होंने बहुत सारे बगुलों की टोली को देखा। उन्हें देखकर उनके मन में आशा जाग गई। उन्हें लगने लगा कि वह स्थान सचमुच रहने लायक है। यदि खतरा होता, तो बगुले भी वहां नहीं रहते। वह दोनों वहां पर रहने लगे और किसी भी आशंका से निश्चिंत हो गए। कुछ बगुलों ने सोनू से दोस्ती भी की। बगुले भय वश मंगरू बंदर के पास नहीं जाते थे।

“सोनू भैया, बंदर से हमें बहुत डर लगता है। एक बार एक बंदर ने मेरी गर्दन पकड़ ली थी। बड़ी मुश्किल से जान बचाई। मेरी जान न बचती। मेरे बगुले दोस्त ने। उस वक्त पर बंदर को एक केला पेश कर दिया और बंदर ने मुझे छोड़ दिया। अरे, हमारे मंगरू काका ऐसे नहीं हैं।

वह किसी पक्षी को नहीं सताते, बल्कि सबकी मदद करते हैं। बड़े नेक स्वभाव के हैं, इसीलिए तो मेरी उनकी बहुत पटती है। सोनू की बगुले के साथ बातचीत चल रही थी। इतने में दूर मंगरू बंदर जमीन पर गिर पड़ा। वह परेशान दिखाई देने लगा। उसकी तबीयत भी खराब हो गई थी। सोनू उड़कर उनके पास पहुंचने ही वाला था कि उन्होंने इशारे से उसे रोक दिया।

सोनू, यहां से चले जाओ, मेरे पास मत आना। मैं महामारी का शिकार हो गया हूं। मैं नहीं चाहता कि तुम्हें भी यह बीमारी लगे। तुम अपनी जान बचाकर यहां से भाग जाओ।

नहीं काका, मैं आपको छोड़कर कैसे चला जाऊं?

देखो सोनू, यहां दिल से नहीं, दिमाग से सोचना है। मैं जानता हूं तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो। जान बूझकर अपनी जान जोखिम में डालना मूर्खता होगी। यहां से जल्दी से निकल जाओ।

बेटे सोनू की आंखों में आंसू भर आए। वह बगुले के पास पहुंच गया। “मेरे काका को बचा लो। क्या ऐसा कोई इलाज है, जो मेरे काका की जान बचा सकता है? इस दुनिया में उनके सिवा मेरा कोई भी नहीं है। मेरे साथ जल्दी चलो। अब समय बहुत कम है।” बगुला सोनू को लेकर उड़ चला। उड़ते उड़ते वे दोनों एक पहाड़ के पास पहुंच गए। “बगुला भाई, यहां भी तो महामारी फैली हुई है।” “हां, मैं जानता हूं, लेकिन दवा भी यहीं है। चलो मेरे साथ।” पहाड़ पर एक जड़ी बूटी देखकर बगुला रुक गया।

उसने उसे तोड़ना चाहा तो एक सर्प बीच में आ गया। सोनू ने उड़कर सर्प को चोंच मार दी। सर्प पीछे मुड़ गया। सोनू ऊपर उड़ गया। उसने फिर से सर्प को अपनी तरफ मोड़ने के लिए चोंच मार दी। इधर सोनू ने बड़ी चालाकी से सर्प को अपनी तरफ व्यस्त कर दिया और उधर बगुले ने जड़ी बूटी को अपने कब्जे में ले लिया। जैसे ही जड़ी बूटी बगुले और सोनू के हाथ में लगी वे दोनों उड़कर अपने क्षेत्र में पहुंच गए।

उन्होंने देखा मंगरू बंदर अचेत पड़ा था। “काका, मैं दवाई ले कर आ गया हूं। अब आपका अच्छे से इलाज हो जाएगा। आंखें खोलिए न, दवा खिलाता हूं।” मंगरू बंदर के मुंह से कोई आवाज नहीं आ रही थी। “देखो तोता भाई, तुमने आने में देर कर दी। अब इन्हें कोई नहीं बचा पाएगा।” “नहीं नहीं, ऐसा मत कहो। मेरे काका को कुछ नहीं होगा। अभी मैं दवा इनके मुंह में डाल रहा हूं।

” सोनू ने दवा मंगरू बंदर के मुंह में डाल दी और पास में बैठ गया। “तोता भाई, इस दवा का सेवन भी कर लो। कोई खतरा नहीं होना चाहिए। हम सभी रोज़ इसका सेवन करते हैं इसीलिए मजे से घूमते रहते हैं।” सोनू ने भी वह दवा खा ली और काका के चेहरे की तरफ आशा भरी नजरों से देखने लगा। मंगरू काका को होश नहीं आ रहा था और सोनू का दिल बैठा जा

उसकी आँखों से लगातार आंसू गिर रहे थे। यह भगवान, मेरे काका को बचा लो। आपका मुझ पर बहुत बड़ा उपकार होगा। मेरे काका ने कभी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा है। उनकी जिंदगी मुझे मेरी जिंदगी से भी ज्यादा प्यारी है। आज उन्हीं की वजह से मैं भी जिंदा हूं। सोनू ने अचानक देखा तो खुशी से उछल पड़ा। मंगरू बंदर ने आंखें खोल दीं और सबसे पहले उन्होंने सोनू को देखा।

“अरे सोनू, तू यहां क्यों बैठा है?”

“काका, अब हमेशा आपके पास ही बैठूंगा। अब न मुझे कुछ होगा, न आपको कुछ होगा। आपने भी दवाई खाई है और मैंने भी। इन सभी ने दवाई खाई है। इसीलिए तो महामारी की बीमारी हम सबने भगाई है।” मंगरू काका को सारी बात की जानकारी मिली और उनके चेहरे पर खुशी छा गई और उन्होंने सोनू को बड़े प्यार से अपने पास ले लिया।

निष्कर्ष

इस हिंदी कहानी का समापन हमें सिखाता है कि मिलजुलकर, एक-दूसरे का समर्थन करके, हम किसी भी संघर्ष को पार कर सकते हैं। सोनू और मंगरू का साथीपन और उनकी बड़ी साहसिकता ने उन्हें जंगली महामारी के खतरे से बचाया और साथ में, वे अपने दोस्तों को भी सहायता पहुंचा सकते हैं। इसके माध्यम से, हमें यहां एक सामाजिक संदेश मिलता है कि एक-दूसरे का साथ देकर हम समस्त समस्याओं को परिहारित कर सकते हैं और एक सशक्त और मित्रपूर्ण समाज बना सकते हैं।

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