हिंदी कहानियां प्रेरणादायक

हिंदी कहानियां प्रेरणादायक – यहां आपको विभिन्न रूपों में प्रस्तुत होने वाली कहानियां मिलेंगी, जो आपको नए दृष्टिकोण और ऊर्जा से भरपूर करेंगी। इन कहानियों में समाज, जीवन, और संबंधों के विभिन्न पहलुओं को महसूस करने का अद्वितीय अवसर है, जिससे आप अपने जीवन को समृद्धि और सफलता की दिशा में मोड़ सकते हैं। इन प्रेरणादायक कहानियों के माध्यम से, अपने सपनों की पूर्ति की ओर एक कदम बढ़ाएं और नई ऊर्जा से अपने जीवन को नई रौंगत में देखें।

संगति का महत्व – हिंदी कहानियां प्रेरणादायक

संगत का महत्व सदियों से हमारे समाज में महत्वपूर्ण रूप से बताया जा रहा है। प्राचीन बुजुर्गों ने सही राह प्रदर्शित करते हुए संगति के महत्व को समझाया है। जिस प्रकार की संगति, वैसा ही आदर्श और गुण लेकर आती है। अगर हमारी संगति सही है, तो हमारा जीवन भी सही दिशा में बढ़ता है। अच्छी संगति हमें सकारात्मकता, उत्साह, और सच्चे मित्रों को प्राप्त करने में मदद करती है। पुरानी कहानी में हमें एक शेर रंगा और उसके पुत्र बहादुर की कहानी मिलती है, जो संगति के महत्व को समझाती है। रंगा का जंगल में राजा बनना और उसकी संगति की शक्ति को दिखाना बहुत महत्वपूर्ण है।

संगति और जीवन का महत्व - हिंदी कहानियां प्रेरणादायक

अगर किसी की संगति गलत है तो गलत होगा और किसी की संगति अच्छी है तो उसमें अच्छे ही गुण आएंगे। क्योंकि संगति से सारे गुण दोष हमारे अंदर आने लगते हैं और हमें पता भी नहीं चलता। पुराने समय की बात है। एक जंगल में एक बहुत ताकतवर शेर रहता था। वह जंगल का राजा था। उसकी पत्नी का नाम मेवा था। उस शेर का नाम रंगा था।

रंगा की ताकत और शोहरत जंगल के कोने कोने तक फैली हुई थी। रंगा के राज में जंगल के जानवर बड़ी खुशी और शांति से अपना जीवन जी रहे थे। समय धीरे धीरे बीतता चला गया। कुछ दिन बाद रंगा की पत्नी मेवा को एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इस पर जंगल वासियों को एक नया राजकुमार मिल गया और उसका नाम बहादुर रखा गया।

समय के साथ रंगा बूढा हो गया था और जल्दी ही राजकुमार बहादुर को जंगल का राजा घोषित कर दिया गया। मगर जब बहादुर सिर्फ छह महीने का था तो अपने साथियों के साथ खेलते खेलते वह जंगल में भटक गया। रंगा और उसकी मां मेवा अपने बहादुर को ढूंढने के लिए निकल पड़े, लेकिन वह कहीं नहीं मिला। उन दोनों को लगा कि शायद भीड़ के किसी झुंड ने बहादुर का शिकार कर लिया है, लेकिन बहादुर दूर निकल गया था। बहादुर को जंगल में चलते चलते बकरियों की एक टोली दिखी। वह दौड़कर उनके पास गया और उनके साथ खेलने लगा। उन्हें अपना दोस्त बना लिया।

अब बहादुर एक शेर का बच्चा होने के बाबजूद भी बकरियों के साथ रहने लगा। लेकिन बड़ा होने के बावजूद भी उसका व्यवहार बकरियों की तरह होने लगा। जब भी कोई भेड़िया या जंगली जानवर उन बकरियों का शिकार करने के लिए आता तब उन बकरियों की तरह वह शेर का बच्चा बहादुर भी भागने लगता और जाकर छिप जाता क्योंकि बकरियों की संगत में रहते रहते वह व्यवहार से बकरी बन चुका था। वह शेर का बच्चा होने के बाद भी जंगली जानवरों से डरकर भागने लगा था। इसलिए कहा गया है कि संगत में गुण होता है। जैसी जिसकी संगत होती है वह वैसा ही हो जाता है।

पुराने बुजुर्गों ने कहा कि अच्छी संगत में रहना चाहिए। जिसकी जैसी संगति होगी उसमें वैसे ही गुण आएंगे। अगर किसी की संगति गलत है तो वह गलत होगा और किसी की संगति अच्छी है तो उसमें अच्छे ही गुण आएंगे। क्योंकि संगति से सारे गुण दोष हमारे अंदर आने लगते हैं और हमें पता भी नहीं चलता। इसलिए आपसे मेरी विनती है कि अपनी संगति को अच्छी रखें। संगति के गुण आपके अंदर आएंगे ही।

इसके साथ, हमें यह सिखना चाहिए कि अच्छी संगति का होना हमें सही राह पर चलने में मदद करता है। हमें खुशहाल और सकारात्मक लोगों के साथ जुड़ना चाहिए जो हमारे लक्ष्यों को समर्थन करें और हमें उन्नति की दिशा में प्रेरित करें।

Inspiration Hindi Story

संगति का महत्व समझना जीवन को सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण कदम है। हमें अपनी संगति को सावधानीपूर्वक चुनना चाहिए ताकि हम अपने लक्ष्यों की प्राप्ति में समर्थ हो सकें। अच्छी संगति हमें सफल और खुशहाल जीवन की दिशा में मदद करती है।

एक चिड़ीया

मित्रों, आज हम आपके सामने एक कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं जो आपके जीवन में एक साथ जड़ जाएगी। यह कहानी छोटी है, लेकिन इसमें बहुत सारा ज्ञान छिपा हुआ है, इसलिए कृपया इसे अंत तक ध्यानपूर्वक सुनें। तो चलिए, दोस्तों, अधिक समय बर्बाद किए बिना हम इस कहानी की शुरुआत करते हैं।

दोस्तों आज एक ऐसी कहानी आपके लिए लेकर आए हैं जो जीवन भर आपके काम आयेगी। दोस्तों यह कहानी छोटी जरूर है परन्तु बहुत ही ज्ञानवर्धक है अतः कहानी को अंत तक जरूर सुनियेगा। तो चलिए दोस्तों आपका ज्यादा समय ना लेते हुए प्रारंभ करते हैं इस कहानी को। दोस्तों एक नदी के किनारे में दो वृक्ष थे।

एक दिन उसी रास्ते से एक छोटी सी चिड़िया गुजरी तो उसने पहले पेड़ से पूछा कि बारिश का महीना प्रारंभ होने वाला है क्या मैं अपने बच्चों के साथ तुम्हारी टहनी में शरण ले सकती हूँ? तो उस पेड़ ने चिड़िया को शरण देने से इंकार कर दिया तो चिड़िया दूसरे पेड़ के पास जाती है और वही सवाल करती है। दूसरा पेड़ शरण दे देता है।

एक चिड़ीया - हिंदी कहानियां प्रेरणादायक

चिड़िया अपने बच्चों को लेकर आई और दूसरे पेड़ पर घोंसला बनाकर रहने लगी। बारिश का मौसम आया और एक दिन इतने जोर की बारिश हुई कि नदी के जल का प्रवाह अत्यधिक तीव्र हो गया, जिसकी वजह से पहला पेड़ जड़ से उखड़ कर पानी में बह गया। जब चिड़िया की नजर उस बहते हुए पेड़ पर पड़ी तो उसने कहा मैं अपने और बच्चों की शरण के लिए तुम्हारे पास आयी थी परन्तु तुमने मना कर दिया था। आज उसी बर्ताव के कारण तुम्हें यह सजा मिली है।

एक चिड़ीया

तब पेड़ ने मुस्कुराते हुए कहा कि मुझे मालूम था कि मेरी जड़ें कमजोर हो चुकी हैं और इस वर्ष की बारिश में मैं ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाऊंगा। इसलिए मैं तुम्हारी और तुम्हारे बच्चों की जान खतरे में नहीं डालना चाहता था। मना करने के लिए मुझे माफ कर दो। यह कहते कहते पेड़ पानी के बहाव में बह गया। दोस्तों, किसी के इनकार को उनकी कठोरता नहीं समझना चाहिए। हो सकता है उनके उसी इंकार की वजह से आपका भला हो जाए। कौन किस परिस्थिति में है इसका पता हम नहीं लगा पाते। इसीलिए किसी के चरित्र और व्यवहार को उनके वर्तमान से नहीं तौलना चाहिए।

ईश्वर भी यही कहते हैं कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के सोच एवं चरित्र को नहीं समझ सकता। यह कार्य केवल ईश्वर ही कर सकते हैं। तो दोस्तों, आज हम संकल्प करते हैं। कि एक दूसरे को ऊंच नीच से न देखकर प्रेम और भाईचारे की नजर से देखने का प्रयास करेंगे। दोस्तों आशा करते हैं यह कहानी आपको अच्छी लगी होगी।

नैतिक शिक्षा पर छोटी कहानी

ऊँटो की एक प्रेरक कहानी

एक गांव में एक व्यक्ति के पास 19 ऊंट थे। एक दिन उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद उसकी लिखी हुई सारी वसीयत पढ़ी गई जिसमें लिखा था कि मेरे 19 ऊंटों में से आधे ऊंट मेरे बेटे को दे दिए जाएं और 19 ऊंटों में से एक चौथाई मेरी बेटी को दिया जाए व उन्हीं 19 ऊंटों में से पांचवां हिस्सा मेरे नौकर को भी दे दिया जाए।

ऊँटो की एक प्रेरक कहानी

इस बंटवारे को सुनकर सभी गांववाले बड़े चक्कर में पड़ गए कि यह बंटवारा कैसे होगा। 19 ऊंटों का आधा हिस्सा करने का मतलब एक ऊंट को काटना पड़ेगा। फिर तो ऊंट ही मर जाएगा और चलो एक ऊंट को काट भी दिया। दो बचे 18 ऊंट तो उनका एक चौथाई, साढ़े चार, साढ़े चार। फिर एक ऊंट को काटना पड़ेगा।

यह बात सोचकर सभी गांव वाले बड़ी उलझन में थे। फिर पड़ोस के गांव से एक बुद्धिमान व्यक्ति को बुलवाया गया। वह बुद्धिमान व्यक्ति अपने ऊंट पर चढ़कर आया। उसने गांव वालों की सारी समस्या सुनी। फिर उसने थोड़ा दिमाग लगाया और बोला, इन 19 ऊंटों में मेरा एक ऊंट को भी मिला कर इनका बंटवारे में बांट दो। सब गांव वालों ने सोचा कि एक तो मरने वाला पागल था जो ऐसी वसीयत लिखकर चला गया और अब यह दूसरा पागल आ गया जो बोलता है कि उनमें मेरा ऊंट भी मिलाकर बांट दो। फिर भी सब गांववालों ने सोचा कि इसकी मर्जी।

हमें इसमें क्या हर्ज है। फिर बुद्धिमान व्यक्ति ने बंटवारा करना शुरू किया। उसने कहा, 19 और एक 20 हुए। 20 का आधा 10 उसके बेटे को दे दिए जाएं और 20 का चौथाई हिस्सा हुआ। पांच उसकी बेटी को दे दिए जाएं। वह T20 का पांचवां हिस्सा चार हुआ और चार वोट उसके नौकर को दे दिए जाएं तो कुल मिलाकर 10 प्लस पाँच प्लस चार बराबर 19 हुए और बच गया। एक ऊंट जो बुद्धिमान व्यक्ति का था, वह उसे लेकर अपने गांव लौट गया। तो दोस्तों इस तरह एक ऊंट मिलने से बाकी 19 ऊंटों का बंटवारा सुख शांति, संतोष व आनंद से हो गया।

ऊँटो की एक प्रेरक कहानी

दोस्तों, हमें किसी के इनकार को उनकी सख्ती के रूप में नहीं देखना चाहिए। शायद उनके इनकार से ही हमारा भला हो। हम ज़रा भी नहीं जान सकते कि व्यक्ति किस परिस्थिति में है। इसलिए, किसी के चरित्र और व्यवहार का मूल्यांकन उनके वर्तमान से नहीं किया जाना चाहिए। ईश्वर भी यही कहते हैं कि एक व्यक्ति दूसरे के मनोबल और चरित्र को समझ नहीं सकता। यह कार्य केवल ईश्वर के लिए संभव है। इसलिए, दोस्तों, आज हम आपसी प्रेम और भाईचारे की दृष्टि से एक दूसरे को देखने का संकल्प करते हैं। हम आशा करते हैं कि यह कहानी आपको पसंद आई होगी।

Seekh Dene Wali Kahani In Hindi

कोयले का टुकड़ा

अमित एक मध्यम वर्गीय परिवार का लड़का था। वह बचपन से ही बहुत आज्ञाकारी और मेहनती था। लेकिन जब उसने कॉलेज में दाखिला लिया तो उसका व्यवहार बदलने लगा। अब न वह पहले की तरह मेहनत करता था और न ही अपने मां बाप की सुनता। यहां तक कि वह घरवालों से झूठ बोलकर पैसे लेने लगा। उसका बदला हुआ आचरण सभी के लिए चिंता का विषय था। जब इसकी वजह जानने की कोशिश की गई तो पता चला कि अमित बुरी संगत में पड़ गया है।

कोयले का टुकड़ा

कॉलेज में उसके कुछ ऐसे दोस्त बन गए जो फिजूलखर्ची, सिनेमा देखने, धूम्रपान आदि से जुड़े हुए थे। पता चलते ही सभी ने अमित को ऐसी दोस्ती छोड़ पढ़ाई लिखाई पर ध्यान देने को कहा। पर अमित का इन बातों से कोई असर नहीं पड़ता। उसका बस एक ही जवाब होता है मुझे अच्छे बुरे की समझ है। मैं भले ही ऐसे लड़कों के साथ रहता हूं पर मुझपर इनका कोई असर नहीं होता है। दिन ऐसे ही बीतते गए और धीरे धीरे परीक्षा के दिन आ गए।

अमित ने परीक्षा के ठीक पहले कुछ मेहनत की पर वह पर्याप्त नहीं थी। वह एक विषय में फेल हो गया। हमेशा अच्छे नंबरों से पास होने वाले अमित के लिए यह किसी जोरदार झटके से कम नहीं था। बल्कि सच तो यह है इसने उसे बिल्कुल तोड़ दिया। अब न वह घर से निकलता और न ही किसी से बात करता। बस दिन रात अपने

कमरे में पड़े कुछ सोचता रहता। उसकी यह स्थिति देख परिवारजन और भी चिंता में पड़ गए। सभी ने उसे पिछला रिजल्ट भूल कर आगे मेहनत करने की सीख दी। पर अमित तो लगा उसको सांप सूंघ चुका था। फेल होने के दुख से वह उभर ही नहीं पा रहा था। अब यह बात अमित के पिछले स्कूल के प्रिंसिपल को पता चली। उन्हें पहले तो यकीन ही नहीं हुआ।

अमित उनके प्रिय छात्रों में से एक था और उसकी यह स्थिति जानकर उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने निश्चय किया कि वह अमित को इस स्थिति से जरूर निकालेंगे। इसी प्रयोजन से उन्होंने एक दिन अमित को अपने घर बुलाया। प्रिंसिपल साहब बाहर बैठे अंगीठी ताप रहे थे। अमित उनके बगल में बैठ गया। अमित बिल्कुल चुप था और प्रिंसिपल साहब भी कुछ नहीं बोल रहे थे। 10 15 मिनट ऐसे ही बीत गए।

किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। फिर अचानक प्रिंसिपल साहब उठे और चिमटे से कोयले के धधकते हुए टुकड़े को निकालकर मिट्टी में डाल दिया। वह टुकड़ा कुछ देर तो गर्मी देता रहा, पर अंततः ठंडा हो गया और बुझ गया। यह देखकर अमित कुछ उत्सुक हुआ और बोला, प्रिंसिपल साहब, आपने उस टुकड़े को मिट्टी में क्यों डाल दिया?

ऐसे तो वह बेकार हो गया। अगर आप उसे अंगीठी में रहने देते तो वह अन्य टुकड़ों की तरह गर्मी देने में काम आता। प्रिंसिपल साहब मुस्कुराए और बोले, बेटा, कुछ देर अंगीठी में बाहर रहने से वह टुकड़ा बेकार नहीं हुआ है। लो। मैं उसे दोबारा अंगीठी में डाल देता हूं और ऐसा कहते हुए उन्होंने वह टुकड़ा दोबारा अंगीठी में डाल दिया।

अंगीठी में जाते ही वह टुकड़ा वापस धीरे धीरे जलने लगा और धधक उठा और पुनः गर्मी देने लगा। कुछ समझे अमित। प्रिंसिपल साहब बोले, तुम उस कोयले के टुकड़े के समान ही तो हो। पहले जब तुम अच्छी संगति में रहते थे, मेहनत करते थे, माता पिता का कहना मानते थे तो अच्छे नंबरों से पास होते थे। पर जैसे वह टुकड़ा कुछ देर के लिए मिट्टी में चला गया, बुझ गया।

तुम भी गलत संगति में पड़ गए और परिणामस्वरूप फेल हो गए। पर यहां ज़रूरी बात यह है कि एक बार फेल होने पर तुम्हारे अंदर वह सारे गुण समाप्त नहीं हो गए हैं, जैसे कोयले का टुकड़ा कुछ देर मिट्टी में पड़े होने के बावजूद बेकार नहीं हुआ और अंगीठी में वापस डालने पर धधक उठा। ठीक उसी तरह तुम भी वापस अच्छी संगति में जाकर मेहनत कर एक बार फिर मेधावी छात्रों की श्रेणी में आ सकते हो। याद रखो, मनुष्य ईश्वर की बनाई सर्वश्रेष्ठ कृति है।

उसके अंदर बड़ी से बड़ी हार को भी जीत में बदलने की ताकत है। उस ताकत को पहचानो। उसकी दी हुई असीम शक्तियों का प्रयोग करो और इस जीवन को सार्थक बनाओ। अमित समझ चुका था कि अब उसे क्या करना है। वह चुपचाप उठा और प्रिंसिपल साहब के चरण स्पर्श किए और निकल पड़ा अपना भविष्य बनाने।

Swami Vivekananda Ki Kahani

भगवान बुद्ध जी की कहानी

भगवान बुद्ध अक्सर अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। एक दिन प्रातःकाल बहुत से भिक्षुक उनका प्रवचन सुनने के लिए बैठे थे। बुद्ध समय पर सभा में पहुंचे पर आज शिष्य उन्हें देखकर चकित थे क्योंकि आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर के आए थे। करीब आने पर शिष्यों ने देखा कि उनके हाथ में एक रस्सी थी।

भगवान बुद्ध जी की कहानी

बुद्ध ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वह रस्सी में गांठें लगाने लगे। वहां उपस्थित सभी लोग यह देख सोच रहे थे कि अब बुद्ध आगे क्या करेंगे। तभी बुद्ध ने सभी से एक प्रश्न किया, मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं। अब मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि क्या यह वही रस्सी है जो गांठें लगाने से पहले थी? एक शिष्य ने उत्तर दिया और कहा, गुरुजी, इसका उत्तर देना तो थोड़ा कठिन है। यह वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर करता है।

एक दृष्टिकोण से देखें तो रस्सी वही है। इसमें कोई बदलाव नहीं आया है। दूसरी तरह से देखें तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं, जो पहले नहीं थी। अतः हम इसे बदला हुआ कह सकते हैं। पर यह बात भी ध्यान देने वाली है कि बाहर से देखने में भले ही यह बदली हुई प्रतीत हो, पर अंदर से तो यह वही है जो पहले थी। बुद्ध ने कहा। सत्य है। अब मैं इन गांठों को खोल देता हूं। इतना कहकर बुद्ध रस्सी के दोनों सिरों को एक दूसरे से दूर खींचने लगे। उन्होंने पूछा, तुम्हें क्या लगता है?

इस प्रकार इनको खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूं? नहीं, नहीं। एक शिष्य ने कहा, ऐसा करने से तो गांठें और भी कस जाएंगी और इन्हें खोलना और भी मुश्किल हो जाएगा। बुद्ध ने कहा, ठीक है, अब एक आखिरी प्रश्न बताओ। इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा? शिष्य बोला, इसके लिए हमें गांठों को गौर से देखना होगा ताकि हम जान सकें कि इन्हें कैसे लगाया गया था। और फिर हम इन्हें खोलने का प्रयास कर सकते हैं।

बुद्ध ने कहा, मैं यही तो सुनना चाहता था। मूल प्रश्न यही है कि जिस समस्या में तुम फंसे हो, वास्तव में उसका कारण क्या है? बिना कारण जाने निवारण असंभव है। मैं देखता हूं कि अधिकतर लोग बिना कारण जाने ही निवारण करना चाहते हैं। कोई मुझसे यह नहीं पूछता कि मुझे क्रोध क्यों आता है। लोग पूछते हैं कि मैं अपने क्रोध का अंत कैसे कर सकता हूं। कोई यह प्रश्न नहीं करता कि मेरे अंदर अहंकार का बीज कहां से आया। लोग पूछते हैं कि मैं अपना अहंकार कैसे खत्म करूं?

प्रिय शिष्यों, जिस प्रकार रस्सी में गांठें लग जाने पर भी उसका बुनियादी स्वरूप नहीं बदलता, ठीक उसी प्रकार मनुष्य में भी कुछ विकार आ जाने से उसके अंदर से अच्छाई के बीज खत्म नहीं होते। जैसे हम रस्सी की गांठें खोल सकते हैं, वैसे ही हम मनुष्य की समस्याएं भी हल कर सकते हैं। इस बात को समझो कि जीवन है तो समस्याएं भी होंगी और समस्याएं हैं तो समाधान भी अवश्य है। आवश्यकता है कि हम किसी भी समस्या के कारण को अच्छी तरह से जानें। निवारण अपने आप ही हो जाएगा।

मेरी भी कीमत है – Bachhon ki kahani

जादुई पतीला


इस कहानी का नाम है जादुई पतीला। सालों पहले पीतल नगर में किशन नाम का एक किसान रहता था। वह गांव के एक जमीनदार के खेत पर काम करके किसी तरह अपना घर चला रहा था। पहले किशन के भी खेत थे, लेकिन उसके पिता के बीमार होने के कारण उसे अपने सारे खेत बेचने पड़े। मजदूरी में मिलने वाले पैसों से पिता का इलाज कराना और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था। वह हर दिन सोचता कि कैसे घर की स्थिति को बेहतर किया जाए।

जादुई पतीला

आज भी इसी सोच के साथ किशन सुबह सुबह जमींदार के खेत पर काम करने के लिए निकला। खुदाई करते समय उसकी कुदाल किसी धातु से टकराई और तेज आवाज हुई। किशन के मन में हुआ कि आखिर ऐसा क्या है यहां। उसने तुरंत उस हिस्से को खोदा तो वहां से एक बड़ा सा पतीला निकला। पतीला देखकर किशन दुखी हो गया। किशन के मन में हुआ कि ये जेवरात होते तो मेरे घर की हालत थोड़ी सुधर जाती। फिर किशन ने सोचा कि चलो अब खाना ही खा लेता हूं।

किशन ने खाना खाने के लिए अपने हाथ की कुदाल उस पतीले में फेंक दी और हाथ मुंह धोकर खाना खाने लगा। खाना खत्म करने के बाद किशन अपनी कुदाल उठाने के लिए उस पतीले के पास पहुंचा। वहां पहुंचते ही किशन हैरान हो गया। उस पतीले के अंदर एक नहीं बल्कि बहुत सारे कुदाल थे। उसे कुछ समझ नहीं आया। तभी उसने अपने पास रखी एक टोकरी को भी उस पतीले में फेंक दिया। वो एक टोकरी भी पतीले के अंदर जाते ही बहुत सारी हो गई।

ये सब देखकर किशन खुश हो गया और उस जादुई पतीले को अपने साथ घर लेकर चला आया। वो हर दिन उस बर्तन में अपने कुछ औजार डालता और जब वो ज्यादा हो जाते तब उन्हें बाजार जाकर बेच आता। ऐसा करते करते किशन के घर की हालत सुधरने लगी। उसने इस तरह से बहुत पैसा कमाया और अपने पिता का इलाज भी करवा लिया।

जादुई पतीला

एक दिन किशन ने कुछ गहने खरीदे और उन्हें भी पतीले में डाल दिया। वो गहने भी बहुत सारे बन गए। इस तरह धीरे धीरे किशन अमीर होने लगा और उसने जमींदार के यहां मजदूरी करना भी छोड़ दिया। किशन को अमीर होते देख जमींदार मोहन को किशन पर शक हुआ। वो सीधे किशन के घर पहुंचा। वहां जाकर उसे जादुई पतीले के बारे में पता चला। उसने किशन से पूछा।

तुमने यह पतीला कब और किसके घर से चुराया? डरी हुई आवाज में किशन बोला, साहब। ये पतीला मुझे खेत में खुदाई के समय मिला था। मैंने किसी के घर चोरी नहीं की है। खेत में खुदाई की बात सुनते ही जमींदार ने कहा। ये पतीला जब मेरे खेत से मिला तो ये मेरा हुआ।

किशन ने जादुई पतीला न लेकर जाने की बहुत मिन्नतें की, लेकिन जमींदार मोहन ने उसकी एक नहीं सुनी। वह जबरदस्ती अपने साथ वह जादुई पतीला लेकर चला गया। जमींदार ने भी किशन की ही तरह उसमें सामान डालकर उन्हें बढ़ाना शुरू किया। एक दिन जमींदार ने अपने घर में मौजूद सारे गहने एक एक करके उस पतीले में डाल दिए और रातों रात बहुत अमीर हो गया। एकदम से जमींदार के अमीर होने की खबर पीतल नगर के राजा तक पहुंच गई। पता लगाने पर राजा को भी जादुई पतीले की जानकारी मिली।

फिर क्या था राजा ने तुरंत अपने लोगों को भेजकर जमींदार के यहां से वह पतीला राजमहल मंगवा लिया। राजमहल में उस जादुई पतीले के पहुंचते ही राजा ने अपने आसपास मौजूद सामान को उसमें डालना शुरू दिया। सामान को बढ़ता देखकर राजा दंग रह गया। होते होते आखिर में राजा खुद उस पतीले के अंदर चला गया। देखते ही देखते उस पतीले से बहुत सारे राजा निकल आए। पतीले से निकला हर राजा बोलता मैं पीतल नगर का असली राजा हूं।

तुम्हें तो इस जादुई पतीले ने बनाया है। ऐसा होते होते सारे राजा आपस में लड़ने लगे और लड़कर मर गए। लड़ाई के दौरान वह जादुई पतीला भी टूट गया। जादुई पतीले के कारण राज महल में हुई इस भयानक लड़ाई के बारे में नगर में सबको पता चल गया। इस बात की जानकारी मिलते ही मजदूर किशन और जमीनदार मोहन ने सोचा अच्छा हुआ कि हमने उस जादुई पतीले का इस्तेमाल सही से किया। उस राजा ने अपनी मूर्खता के कारण अपनी जान ही खो दी।

 प्रेरणादायक हिंदी कहानियां – Story in Hindi | Hindi Story | Hindi Kahaniya | Moral Story

जादुई पतीले की कहानी से दो सीख मिलती हैं। पहले की मूर्खता का अंत बुरा ही होता है। दूसरी यह कि हर सामान का इस्तेमाल संभलकर करना चाहिए। अति हानिकारक हो सकती है।

इन कहानियों से हमें सीख मिलती है कि हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए, दूसरों की मदद करनी चाहिए और सकारात्मक सोच रखनी चाहिए।

Leave a Comment