Buddhist Story in Hindi (भगवान बुद्ध की प्रेरक कहानियां)

अंगुलीमाल डाकू की कहानी – Buddhist Story in Hindi

अंगुलीमाल डाकू की कहानी - Buddhist Story in Hindi

यह कहानी उस समय की है, जब भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ भिक्षा के लिए एक गांव में गए थे। वहां के लोगों ने उन्हें बहुत सम्मान से भोजन दिया, और उनसे उनके उपदेश सुनने के लिए कहा। बुद्ध ने उन्हें अपने धर्म का उपदेश दिया, और उन्हें अहिंसा, करुणा, और शांति का मार्ग दिखाया। लोगों को बुद्ध के उपदेश से बहुत प्रभावित हुआ, और वे उनके अनुयायी बन गए।

बुद्ध और उनके शिष्य गांव से निकलकर एक जंगल की ओर चल पड़े। जंगल में उन्हें एक डाकू का सामना करना पड़ा, जिसका नाम अंगुलीमाल था। अंगुलीमाल एक अत्यंत क्रूर और निर्दयी डाकू था, जो लोगों को मारकर उनकी ऊंगलियां काटकर अपने गले में माला बनाता था। उसने अपने जीवन में नौ सौ नौंवे लोगों को मार दिया था, और वह अपना हजारवां शिकार ढूंढ रहा था।

अंगुलीमाल ने बुद्ध को देखकर सोचा कि यह उसका हजारवां शिकार होगा। उसने अपनी तलवार उठाई, और बुद्ध के पीछे दौड़ा। बुद्ध तो शांति से चल रहे थे, और उन्हें अंगुलीमाल का पीछा करने का कोई ध्यान नहीं था। अंगुलीमाल ने बुद्ध को पकड़ने की कोशिश की, पर वह उन्हें पकड़ नहीं पाया। बुद्ध तो आराम से चल रहे थे, पर अंगुलीमाल को लगता था कि वे तेजी से भाग रहे हैं। अंगुलीमाल थक गया, और उसने बुद्ध से चिल्लाकर कहा, “रुको, रुको!”

बुद्ध ने रुककर पलटकर देखा, और अंगुलीमाल से कहा, “मैं तो कब का रुक गया हूं, अंगुलीमाल। तुम तो अभी भी भाग रहे हो। तुम अपने अन्धे लोभ, क्रोध, और हिंसा के भागे जा रहे हो। तुम अपने अपने कर्मों के बंधन में फंसे हुए हो। तुम अपने अपने दुःखों के बढ़ते जा रहे हो। मैं तो इन सबसे छूट गया हूं, अंगुलीमाल। मैं तो शांति, करुणा, और बोध का मार्ग चल रहा हूं। मैं तो सुख, आनंद, और मुक्ति की ओर बढ़ रहा हूं।”

अंगुलीमाल ने बुद्ध की बातों को सुना, और उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने अपनी तलवार फेंक दी, और बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। उसने बुद्ध से क्षमा मांगी, और उनका शिष्य बनने की इच्छा जताई। बुद्ध ने उसे क्षमा कर दिया, और उसे अपने साथ ले गए। अंगुलीमाल ने बुद्ध के उपदेशों का पालन किया, और उसने अपने जीवन को बदल दिया। वह एक डाकू से एक धर्मात्मा बन गया, और उसका नाम अहिंसक बन गया।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है, कि कोई भी इंसान कितना भी बुरा हो, वह बदल सकता है। बस उसे एक सच्चे गुरु की जरूरत है, जो उसे अपने अंधेरे से निकालकर उजाले की ओर ले जाए। बुद्ध ने अंगुलीमाल को ऐसा ही गुरु बनकर उसकी रक्षा की, और उसे अपने दुःखों से मुक्ति दी। अंगुलीमाल ने भी बुद्ध के प्रति अपना श्रद्धा और भक्ति दिखाई, और उसने अपने जीवन को बुद्ध के उपदेशों के अनुसार जीना शुरू किया। वह एक अहिंसक, करुणामय, और बोधिसत्त्व बन गया, और उसने अपने गांव के लोगों को भी बुद्ध के मार्ग पर लाने का प्रयास किया।

इस प्रकार, अंगुलीमाल डाकू की कहानी एक अद्भुत और प्रेरणादायक कहानी है, जो हमें यह बताती है कि बुद्ध का ज्ञान और करुणा किसी भी इंसान को बदल सकती है, और उसे अपने अपने दुःखों से उबार सकती है। हमें भी अपने जीवन में बुद्ध के उपदेशों का पालन करना चाहिए, और अपने आप को और दूसरों को खुश और शांत रखना चाहिए।

भगवान बुद्ध का ज्ञान – Buddhist Story in Hindi

भगवान बुद्ध का ज्ञान - Buddhist Story in Hindi

यह कहानी उस समय की है, जब भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ वाराणसी में रहते थे। वहां के लोगों ने उन्हें बहुत सम्मान और प्रेम से घर-घर भिक्षा दी, और उनके उपदेश सुनने के लिए उनके पास आते थे। बुद्ध ने उन्हें अपने धर्म का उपदेश दिया, और उन्हें दुःख के कारण और उपशमन का मार्ग बताया। लोगों को बुद्ध के उपदेश से बहुत लाभ हुआ, और वे उनके अनुयायी बन गए।

एक दिन, बुद्ध और उनके शिष्य एक नदी के किनारे बैठे थे। वहां एक नाविक था, जो अपनी नाव को बनाने के लिए लकड़ियां काट रहा था। वह बहुत ही उद्योगी और चतुर था, और उसकी नाव बहुत ही सुंदर और मजबूत थी। बुद्ध ने उसे देखा, और उससे कहा, “हे नाविक, तुम अपनी नाव को बहुत अच्छी तरह से बना रहे हो। तुम्हें इसका गौरव होना चाहिए।”

नाविक ने बुद्ध को देखा, और उसने कहा, “धन्यवाद, महाराज। मुझे अपनी नाव को बनाने में बहुत आनंद आता है। मुझे इसका गौरव नहीं है, बल्कि इसका प्रेम है। मुझे अपनी नाव से प्यार है, क्योंकि यह मेरा जीवन है। यह मुझे अपना पेट भरने का साधन देती है, और मुझे अन्य लोगों की मदद करने का अवसर देती है। मुझे अपनी नाव को बनाने का ज्ञान है, और मुझे इसका अभ्यास है। मुझे अपनी नाव को बनाने का कला है, और मुझे इसका आनंद है।”

बुद्ध ने उसकी बातों को सुना, और उसे प्रशंसा की। फिर उन्होंने उससे कहा, “हे नाविक, तुम्हारी बातें बहुत ही सत्य और सुंदर हैं। तुम्हें अपनी नाव के प्रति जो प्रेम है, वही प्रेम तुम्हें अपने आत्मा के प्रति भी होना चाहिए। तुम्हें अपनी नाव को बनाने का जो ज्ञान है, वही ज्ञान तुम्हें अपने आत्मा को जानने का भी होना चाहिए। तुम्हें अपनी नाव को बनाने का जो अभ्यास है, वही अभ्यास तुम्हें अपने आत्मा को शुद्ध करने का भी होना चाहिए। तुम्हें अपनी नाव को बनाने का जो कला है, वही कला तुम्हें अपने आत्मा को सुंदर बनाने का भी होना चाहिए। तुम्हें अपनी नाव को बनाने का जो आनंद है, वही आनंद तुम्हें अपने आत्मा को आनंदित करने का भी होना चाहिए।”

नाविक ने बुद्ध की बातों को सुना, और उसे अपने आत्मा के बारे में जानने की इच्छा हुई। उसने बुद्ध से कहा, “महाराज, मुझे अपनी नाव के बारे में तो सब कुछ पता है, पर मुझे अपने आत्मा के बारे में कुछ भी नहीं पता है। मुझे अपने आत्मा को कैसे जानूं, कैसे शुद्ध करूं, कैसे सुंदर बनाऊं, और कैसे आनंदित करूं? मुझे इसका ज्ञान दीजिए, मुझे इसका अभ्यास दीजिए, मुझे इसका कला दीजिए, मुझे इसका आनंद दीजिए।”

बुद्ध ने उसकी बातों को सुना, और उसे अपने आत्मा के बारे में जानने का मार्ग बताया। बुद्ध ने उसे अपने धर्म का उपदेश दिया, और उसे चार आर्य सत्य, आठ आर्य अष्टांगिक मार्ग, और दस पारमिता का ज्ञान दिया। बुद्ध ने उसे अपने आत्मा को शुद्ध करने का अभ्यास दिया, और उसे शील, समाधि, और प्रज्ञा का अभ्यास करने को कहा। बुद्ध ने उसे अपने आत्मा को सुंदर बनाने का कला दिया, और उसे करुणा, मुदिता, उपेक्षा, और मैत्री का कला सिखाया। बुद्ध ने उसे अपने आत्मा को आनंदित करने का आनंद दिया, और उसे निर्वाण का आनंद अनुभव करने को कहा।

नाविक ने बुद्ध की बातों को सुना, और उसे अपने आत्मा के बारे में जानने का उत्साह हुआ। उसने बुद्ध के उपदेशों का पालन किया, और उसने अपने जीवन को बुद्ध के उपदेशों के अनुसार जीना शुरू किया। वह एक नाविक से एक बौद्ध बन गया, और उसका नाम नागसेन बन गया।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है, कि बुद्ध का ज्ञान और आनंद हमारे आत्मा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हमें अपने आत्मा को जानना, शुद्ध करना, सुंदर बनाना, और आनंदित करना चाहिए। हमें अपने आत्मा को बुद्ध के मार्ग पर ले जाना चाहिए, और उसे निर्वाण की ओर बढ़ाना चाहिए।

राई के दाने – Buddhist Story in Hindi

राई के दाने - Buddhist Story in Hindi

यह कहानी उस समय की है, जब भगवान बुद्ध को राजगृह नगरी में एक बुढ़ा वैद्य मिला, जिसका नाम जीवक था। जीवक एक बहुत ही प्रसिद्ध और गुणी वैद्य था, जिसने अनेक रोगियों को उनकी बीमारियों से मुक्त किया था। जीवक ने भगवान बुद्ध का आदर किया, और उन्हें अपने आश्रम में आमंत्रित किया। भगवान बुद्ध ने जीवक का निमंत्रण स्वीकार किया, और उनके साथ अपने कुछ शिष्यों को भी ले गए।

जीवक के आश्रम में पहुंचकर, भगवान बुद्ध ने उसे पूछा, “हे जीवक, तुम्हारा यह आश्रम बहुत ही सुंदर और शांत है। तुम्हें यहां रहने में कैसा लगता है?” जीवक ने कहा, “महाराज, मुझे यहां रहने में बहुत ही आनंद आता है। मुझे यहां अपना काम करने में बहुत ही संतोष होता है। मुझे यहां अपने रोगियों को उनकी बीमारियों से छुटकारा दिलाने में बहुत ही प्रसन्नता होती है। मुझे यहां अपने ज्ञान, अनुभव, और कौशल का प्रयोग करने में बहुत ही गर्व होता है।”

भगवान बुद्ध ने उसकी बातों को सुना, और उसे प्रशंसा की। फिर उन्होंने उससे कहा, “हे जीवक, तुम्हारी बातें बहुत ही सत्य और सुंदर हैं। तुम्हें अपने आश्रम के प्रति जो प्रेम है, वही प्रेम तुम्हें अपने आत्मा के प्रति भी होना चाहिए। तुम्हें अपने रोगियों को उनकी बीमारियों से छुटकारा दिलाने का जो ज्ञान है, वही ज्ञान तुम्हें अपने आत्मा को उनके दुःखों से मुक्त करने का भी होना चाहिए। तुम्हें अपने ज्ञान, अनुभव, और कौशल का प्रयोग करने का जो अभ्यास है, वही अभ्यास तुम्हें अपने आत्मा को शुद्ध, निर्मल, और निर्दोष बनाने का भी होना चाहिए। तुम्हें अपने रोगियों को उनकी बीमारियों से छुटकारा दिलाने में जो प्रसन्नता होती है, वही प्रसन्नता तुम्हें अपने आत्मा को उनके दुःखों से मुक्त करने में भी होनी चाहिए।”

जीवक ने भगवान बुद्ध की बातों को सुना, और उसे अपने आत्मा के बारे में जानने की इच्छा हुई। उसने भगवान बुद्ध से कहा, “महाराज, मुझे अपने रोगियों के बारे में तो सब कुछ पता है, पर मुझे अपने आत्मा के बारे में कुछ भी नहीं पता है। मुझे अपने आत्मा को कैसे जानूं, कैसे शुद्ध करूं, कैसे निर्मल बनाऊं, और कैसे निर्दोष बनाऊं? मुझे इसका ज्ञान दीजिए, मुझे इसका अभ्यास दीजिए, मुझे इसका आनंद दीजिए।”

भगवान बुद्ध ने उसकी बातों को सुना, और उसे अपने आत्मा के बारे में जानने का मार्ग बताया। भगवान बुद्ध ने उसे अपने धर्म का उपदेश दिया, और उसे चार आर्य सत्य, आठ आर्य अष्टांगिक मार्ग, और दस पारमिता का ज्ञान दिया। भगवान बुद्ध ने उसे अपने आत्मा को शुद्ध करने का अभ्यास दिया, और उसे शील, समाधि, और प्रज्ञा का अभ्यास करने को कहा। भगवान बुद्ध ने उसे अपने आत्मा को सुंदर बनाने का कला दिया, और उसे करुणा, मुदिता, उपेक्षा, और मैत्री का कला सिखाया। भगवान बुद्ध ने उसे अपने आत्मा को आनंदित करने का आनंद दिया, और उसे निर्वाण का आनंद अनुभव करने को कहा।

जीवक ने भगवान बुद्ध की बातों को सुना, और उसे अपने आत्मा के बारे में जानने का उत्साह हुआ। उसने भगवान बुद्ध के उपदेशों का पालन किया, और उसने अपने जीवन को बुद्ध के उपदेशों के अनुसार जीना शुरू किया। वह एक वैद्य से एक बौद्ध बन गया, और उसका नाम जीवक बुद्ध बन गया।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है, कि भगवान बुद्ध का ज्ञान और आनंद हमारे आत्मा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हमें अपने आत्मा को जानना, शुद्ध करना, सुंदर बनाना, और आनंदित करना चाहिए। हमें अपने आत्मा को बुद्ध के मार्ग पर ले जाना चाहिए, और उसे निर्वाण की ओर बढ़ाना चाहिए।

पहचान – Buddhist Story in Hindi

पहचान - Buddhist Story in Hindi

यह कहानी उस समय की है, जब भगवान बुद्ध को एक राजा मिला, जिसका नाम श्रेणिक था। श्रेणिक एक बहुत ही धनी और शक्तिशाली राजा था, लेकिन उसे अपनी पहचान का गर्व था। वह अपने आप को सबसे बड़ा और सबसे बेहतर समझता था। वह अपने राज्य में किसी की भी बात नहीं मानता था, और अपनी मर्जी के अनुसार शासन करता था। वह अपने प्रजा को बहुत ही जुल्म और अन्याय करता था। वह अपने राज्य में बुद्ध के उपदेशों को भी नहीं मानता था, और उन्हें झूठे और भ्रामक समझता था।

एक दिन, भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों के साथ श्रेणिक के राज्य में प्रवेश किया। उन्होंने एक वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान लगाया। श्रेणिक को यह पता चला, तो वह बुद्ध को अपने राज्य से निकालने का फैसला किया। वह अपने सैनिकों को भेजकर बुद्ध को धमकाने का आदेश दिया। सैनिक बुद्ध के पास पहुंचे, और उन्हें बोले, “हे बुद्ध, हमारे राजा श्रेणिक ने तुम्हें इस राज्य से तुरंत निकलने का आदेश दिया है। अगर तुम नहीं माने, तो हम तुम्हें जिंदा जला देंगे।”

भगवान बुद्ध ने उनकी बातों को सुना, और उन्हें शांति से बोला, “हे सैनिक, तुम्हें क्या लगता है, कि तुम मुझे जला सकते हो? तुम्हें क्या लगता है, कि तुम्हारा राजा श्रेणिक मुझसे बड़ा है? तुम्हें क्या लगता है, कि तुम्हारा राज्य मुझे भयभीत कर सकता है? तुम्हें बता दूं, कि तुम सब अपनी पहचान से अनजान हो। तुम्हें अपने आत्मा की पहचान नहीं है। तुम्हें अपने आत्मा का ज्ञान नहीं है। तुम्हें अपने आत्मा का आनंद नहीं है। तुम अपने आत्मा को जानने का प्रयास नहीं करते हो, बल्कि अपने शरीर, अपने नाम, अपने पद, अपने धन, अपने शक्ति, अपने राज्य, अपने गर्व, अपने अहंकार, अपने लोभ, अपने क्रोध, अपने मोह, अपने ईर्ष्या, अपने द्वेष, अपने भय, अपने दुःख, अपने दुर्भाग्य, अपने अज्ञान, और अपने दुष्कर्म में फंसे हुए हो। तुम अपने आत्मा को नहीं जानते, इसलिए तुम मुझे नहीं जानते। तुम मुझे नहीं जानते, इसलिए तुम मुझे जला नहीं सकते।”

सैनिक भगवान बुद्ध की बातों को सुनकर चौंक गए। उन्होंने कभी ऐसी बातें नहीं सुनी थी। उन्हें भगवान बुद्ध की बातों में एक अद्भुत शक्ति महसूस हुई। उन्हें भगवान बुद्ध की बातों में एक अनोखा सत्य दिखाई दिया। उन्हें भगवान बुद्ध की बातों में एक अपूर्व आनंद अनुभव हुआ। उन्होंने अपने हाथों में तलवार फेंक दी, और भगवान बुद्ध के चरणों में गिर पड़े। उन्होंने भगवान बुद्ध से क्षमा मांगी, और उनका शिष्य बनने की इच्छा जताई। भगवान बुद्ध ने उन्हें क्षमा कर दिया, और उन्हें अपने साथ ले गए। उन्होंने उन्हें अपने धर्म का उपदेश दिया, और उन्हें अपने आत्मा की पहचान करने का मार्ग दिखाया। वे सैनिक बुद्ध के उपदेशों का पालन करने लगे, और उन्होंने अपने जीवन को बुद्ध के उपदेशों के अनुसार जीना शुरू किया। वे एक सैनिक से एक बौद्ध बन गए, और उनका नाम श्रेणिक बुद्ध बन गया।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है, कि भगवान बुद्ध का ज्ञान और आनंद हमारे आत्मा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हमें अपने आत्मा को जानना, शुद्ध करना, सुंदर बनाना, और आनंदित करना चाहिए। हमें अपने आत्मा को बुद्ध के मार्ग पर ले जाना चाहिए, और उसे निर्वाण की ओर बढ़ाना चाहिए।

सब कुछ स्वीकार करना जरुरी नहीं – Buddhist Story in Hindi

सब कुछ स्वीकार करना जरुरी नहीं - Buddhist Story in Hindi

यह कहानी उस समय की है, जब भगवान बुद्ध को एक युवक मिला, जिसका नाम विशाल था। विशाल एक बहुत ही बुद्धिमान और विद्वान युवक था, लेकिन उसे अपनी बातों को सबको स्वीकार करवाने का जुनून था। वह अपने विचारों को सबसे बेहतर समझता था, और दूसरों के विचारों को नकारता था। वह अपने विवाद कौशल से लोगों को अपनी बात मानने पर मजबूर करता था, और उन्हें अपने विचारों को स्वीकार करने के लिए दबाव डालता था। वह अपने विचारों को सबको स्वीकार करवाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता था।

एक दिन, विशाल ने सुना कि भगवान बुद्ध उसके शहर में आए हैं, और लोगों को अपने धर्म का उपदेश दे रहे हैं। विशाल ने सोचा कि यह एक अच्छा मौका है, अपने विवाद कौशल का प्रदर्शन करने का। वह अपने आप को बुद्ध से बड़ा और बुद्धिमान समझता था, और उन्हें अपने विचारों को स्वीकार करवाने का इरादा रखता था। वह बुद्ध के पास गया, और उनसे विवाद करने लगा। वह बुद्ध के उपदेशों को आलोचना करता, उनके विरोध में तर्क देता, और उन्हें अपने विचारों को स्वीकार करने के लिए चुनौती देता।

भगवान बुद्ध ने उसकी बातों को सुना, और उसे शांति से बोला, “हे विशाल, तुम्हारे विचार बहुत ही उत्कृष्ट और विशिष्ट हैं। तुम्हारा विवाद कौशल बहुत ही अद्भुत और अद्वितीय है। तुम्हारा विश्वास बहुत ही दृढ़ और निर्भय है। तुम्हें अपने विचारों के प्रति जो गर्व है, वही गर्व तुम्हें अपने विचारों को सबको स्वीकार करवाने का जुनून देता है। तुम्हें लगता है, कि तुम्हारे विचार ही सत्य हैं, और दूसरों के विचार ही मिथ्या हैं। तुम्हें लगता है, कि तुम्हारे विचार ही श्रेष्ठ हैं, और दूसरों के विचार ही नीच हैं। तुम्हें लगता है, कि तुम्हारे विचार ही उद्धारक हैं, और दूसरों के विचार ही विनाशक हैं।”

बुद्ध ने आगे कहा, “हे विशाल, तुम्हारी बातों में बहुत ही बुद्धि और विवेक है। तुम्हारी बातों में बहुत ही ज्ञान और अनुभव है। तुम्हारी बातों में बहुत ही तर्क और प्रमाण है। तुम्हारी बातों में बहुत ही शक्ति और प्रभाव है। तुम्हारी बातों में बहुत ही रूचि और आकर्षण है। तुम्हारी बातों में बहुत ही आनंद और संतोष है। तुम्हारी बातों में बहुत ही उत्साह और उमंग है।”

बुद्ध ने फिर कहा, “हे विशाल, तुम्हारी बातों में इतना सब कुछ है, तो फिर तुम्हें और क्या चाहिए? तुम्हें क्यों जरूरत है, कि तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाना है? तुम्हें क्या फायदा होगा, अगर तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाना होगा? तुम्हें क्या खुशी मिलेगी, अगर तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाना होगा? तुम्हें क्या शांति मिलेगी, अगर तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाना होगा? तुम्हें क्या मुक्ति मिलेगी, अगर तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाना होगा?”

बुद्ध ने आगे कहा, “हे विशाल, तुम्हें बता दूं, कि तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह तुम्हारी दुर्बलता है, न कि तुम्हारी ताकत। तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह तुम्हारा अज्ञान है, न कि तुम्हारा ज्ञान। तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह तुम्हारा दुःख है, न कि तुम्हारा आनंद। तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह तुम्हारा बंधन है, न कि तुम्हारा मुक्ति।”

बुद्ध ने फिर कहा, “हे विशाल, तुम्हें यह समझना होगा, कि सब कुछ स्वीकार करना जरूरी नहीं है। तुम्हें यह समझना होगा, कि सब कुछ अस्थिर है, और सब कुछ बदलता है। तुम्हें यह समझना होगा, कि सब कुछ अनात्मा है, और सब कुछ शून्य है। तुम्हें यह समझना होगा, कि सब कुछ दुःखमय है, और सब कुछ निर्वाणमय है। तुम्हें यह समझना होगा, कि सब कुछ तुम्हारा नहीं है, और सब कुछ तुम्हारा ही है।”

बुद्ध ने आखिर में कहा, “हे विशाल, तुम्हें यह जानना होगा, कि तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह से तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा, बल्कि तुम्हें कुछ भी नहीं बचेगा। तुम्हें यह जानना होगा, कि तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह से तुम्हें कुछ भी नहीं हासिल होगा, बल्कि तुम्हें कुछ भी नहीं रहेगा। तुम्हें यह जानना होगा, कि तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह से तुम्हें कुछ भी नहीं बढ़ेगा, बल्कि तुम्हें कुछ भी नहीं घटेगा। तुम्हें यह जानना होगा, कि तुम्हारी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह से तुम्हें कुछ भी नहीं बचाएगा, बल्कि तुम्हें कुछ भी नहीं बर्बाद करेगा।”

विशाल भगवान बुद्ध की बातों को सुनकर चौंक गया। उसने कभी ऐसी बातें नहीं सुनी थी। उसने अपनी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह को एक बड़ी भूल समझा। उसने अपनी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह को एक बड़ा दोष माना। उसने अपनी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह को एक बड़ा श्राप जाना। उसने अपनी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह को एक बड़ा बोझ पाया।

विशाल ने अपनी बातों को सबको स्वीकार करवाने की चाह को त्याग दिया, और भगवान बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा। उसने भगवान बुद्ध से क्षमा मांगी, और उनका शिष्य बनने की इच्छा जताई। भगवान बुद्ध ने उसे क्षमा कर दिया, और उन्हें अपने साथ ले गए। उन्होंने उसे अपने धर्म का उपदेश दिया, और उन्हें अपने आत्मा की पहचान करने का मार्ग दिखाया। विशाल बुद्ध के उपदेशों का पालन करने लगा, और उन्होंने अपने जीवन को बुद्ध के उपदेशों के अनुसार जीना शुरू किया। वह एक विवादी से एक बौद्ध बन गया, और उसका नाम विशाल बुद्ध बन गया।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है, कि भगवान बुद्ध का ज्ञान और आनंद हमारे आत्मा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हमें अपने आत्मा को जानना, शुद्ध करना, सुंदर बनाना, और आनंदित करना चाहिए। हमें अपने आत्मा को बुद्ध के मार्ग पर ले जाना चाहिए, और उसे निर्वाण की ओर बढ़ाना चाहिए। हमें सब कुछ स्वीकार करना जरूरी नहीं है, बल्कि सब कुछ समझना जरूरी है।

गिलहरी की इस शिक्षा के बाद बुद्ध को मिला था आत्मज्ञान – Buddhist Story in Hindi

गिलहरी की इस शिक्षा के बाद बुद्ध को मिला था आत्मज्ञान - Buddhist Story in Hindi
गिलहरी की इस शिक्षा के बाद बुद्ध को मिला था आत्मज्ञान – Buddhist Story in Hindi

एक बार की बात है, भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक वन में घूम रहे थे। उन्होंने एक सुंदर सरोवर देखा, जिसमें तरह-तरह के पक्षी और जानवर आते-जाते थे। बुद्ध ने अपने शिष्यों को कहा, “आओ, हम इस सरोवर के किनारे बैठकर विश्राम करें। यहां का दृश्य बहुत ही मनोहारी है।” शिष्यों ने बुद्ध की बात मानी और वे सब सरोवर के किनारे बैठ गए।

बुद्ध ने अपनी आँखें बंद करके ध्यान में लीन हो गए। उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हो चुकी थी, लेकिन वे अपने शिष्यों को भी उसी स्तर तक पहुंचाना चाहते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को अपने अनुभवों और उपदेशों का वर्णन किया, और उन्हें धर्म का मार्ग दिखाया। शिष्यों ने बुद्ध की बातों को ध्यान से सुना, और उन्हें अपने आत्मा की पहचान करने का प्रयास किया।

इसी दौरान, बुद्ध की नजर एक नन्ही गिलहरी पर पड़ी, जो सरोवर के पास आई थी। गिलहरी ने एक छोटा-सा पत्थर उठाया, और उसे सरोवर में फेंक दिया। फिर वह दूसरा पत्थर उठाया, और उसे भी सरोवर में फेंक दिया। यह क्रम वह लगातार जारी रखती रही। बुद्ध ने सोचा, “यह कैसी गिलहरी है? क्या वह सरोवर को सूखाने की कोशिश कर रही है? क्या वह इस बेकार के काम में अपना समय और शक्ति बर्बाद कर रही है?” बुद्ध ने अपने ध्यान को तोड़ा, और गिलहरी से पूछा, “हे गिलहरी, तुम क्या कर रही हो? क्या तुम्हें पता है, कि तुम्हारा यह काम बेकार है? तुम इस सरोवर का जल कभी नहीं सुखा सकोगी। तुम अपना जीवन व्यर्थ में नष्ट कर रही हो।”

गिलहरी ने बुद्ध की बात सुनी, और उसने मुस्कुराते हुए कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें क्या लगता है, कि मैं यह काम क्यों कर रही हूँ? क्या तुम्हें लगता है, कि मैं सरोवर को सूखाने की कोशिश कर रही हूँ? नहीं, मैं ऐसा नहीं कर रही हूँ। मैं तो बस अपना कर्तव्य निभा रही हूँ। मुझे पता है, कि मैं इस सरोवर का जल सुखा नहीं सकती, लेकिन मुझे इस बात का भी पता है, कि मैं अपनी शक्ति के अनुसार जो कुछ कर सकती हूँ, वह करना चाहिए। मुझे इस बात का भी पता है, कि मेरा यह काम बेकार नहीं है, बल्कि यह मेरे लिए एक अभ्यास है। मुझे इस बात का भी पता है, कि मेरा जीवन व्यर्थ नहीं है, बल्कि यह मेरे लिए एक अवसर है।”

बुद्ध ने गिलहरी की बात सुनकर चौंक गए। उन्हें लगा, कि वह एक साधारण गिलहरी है, लेकिन उसके पास एक अद्भुत बुद्धि है। उन्हें लगा, कि वह एक महत्वपूर्ण सीख दे रही है। उन्होंने गिलहरी से पूछा, “हे गिलहरी, तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपना कर्तव्य निभा रही हो, तो बताओ, तुम्हारा कर्तव्य क्या है? तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपना अभ्यास कर रही हो, तो बताओ, तुम्हारा अभ्यास क्या है? तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपना अवसर पायी हो, तो बताओ, तुम्हारा अवसर क्या है?”

गिलहरी ने बुद्ध की बात सुनी, और उसने खुशी से कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें बता दूं, कि मेरा कर्तव्य यह है, कि मैं इस सरोवर को स्वच्छ रखूँ। मुझे पता है, कि इस सरोवर में बहुत सारे जीव रहते हैं, जो इसके जल का उपयोग करते हैं। मुझे पता है, कि इस सरोवर का जल उनके लिए जीवन है। मुझे पता है, कि इस सरोवर का जल उनके लिए आनंद है। मुझे पता है, कि इस सरोवर का जल उनके लिए शांति है। मुझे पता है, कि इस सरोवर का जल उनके लिए मुक्ति है। इसलिए, मैं इस सरोवर को स्वच्छ रखने का प्रयास करती हूँ, और इसमें जो भी अशुद्धि आती है, उसे निकालती हूँ। मैं इसे अपना कर्तव्य मानती हूँ, और इसे अपना धर्म मानती हूँ।”

गिलहरी ने आगे कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें बता दूं, कि मेरा अभ्यास यह है, कि मैं इस सरोवर को प्यार करती हूँ। मुझे पता है, कि इस सरोवर में बहुत सारी सुंदरता है, जो मुझे खुश करती है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में बहुत सारी कला है, जो मुझे प्रेरित करती है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में बहुत सारी विविधता है, जो मुझे सीखती है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में बहुत सारी चमत्कार है, जो मुझे आश्चर्यचकित करती है। इसलिए, मैं इस सरोवर को प्यार करने का अभ्यास करती हूँ, और इसमें जो भी अच्छाई है, उसे अपनाती हूँ। मैं इसे अपना अभ्यास मानती हूँ, और इसे अपना कला मानती हूँ।”

गिलहरी ने फिर कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें बता दूं, कि मेरा अवसर यह है, कि मैं इस सरोवर को सेवा करती हूँ। मुझे पता है, कि इस सरोवर से मुझे बहुत कुछ मिलता है, जो मेरे लिए उपयोगी है। मुझे पता है, कि इस सरोवर से मुझे बहुत कुछ सिखने को मिलता है, जो मेरे लिए शिक्षा है। मुझे पता है, कि इस सरोवर से मुझे बहुत कुछ देखने को मिलता है, जो मेरे लिए दर्शन है। मुझे पता है, कि इस सरोवर से मुझे बहुत कुछ अनुभवने को मिलता है, जो मेरे लिए आनुभूति है। इसलिए, मैं इस सरोवर को सेवा करने का अवसर पाती हूँ, और इसमें जो भी जरूरत है, उसे पूरा करती हूँ। मैं इसे अपना अवसर मानती हूँ, और इसे अपना धन्यवाद मानती हूँ।”

बुद्ध ने गिलहरी की बातों को सुनकर अद्भुत आनंद अनुभव किया। उन्हें लगा, कि वह एक साधारण गिलहरी है, लेकिन उसके पास एक अद्भुत आत्मज्ञान है। उन्हें लगा, कि वह एक अनजान गिलहरी है, लेकिन उसने उन्हें एक महत्वपूर्ण शिक्षा दी है। उन्होंने गिलहरी से कहा, “हे गिलहरी, तुमने मुझे एक बड़ा उपकार किया है। तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपना कर्तव्य, अभ्यास और अवसर कैसे पहचानती हो, और कैसे निभाती हो। 

तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपने काम में अपनी शक्ति, बुद्धि, विवेक, ज्ञान, अनुभव, तर्क, प्रमाण, शक्ति, प्रभाव, रूचि, आकर्षण, आनंद, संतोष, उत्साह और उमंग का प्रयोग करती हो। तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपने काम में अपनी दया, करुणा, मैत्री, क्षमा, सहनशीलता, समता, संतुलन, समाधान, शांति, अनुराग, प्रेम, सेवा, धन्यवाद और भक्ति का प्रदर्शन करती हो। तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपने काम में अपनी गर्व, अहंकार, अज्ञान, दुःख, बंधन, दोष, भूल, श्राप और बोझ को त्याग देती हो। तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपने काम में अपनी आत्मा को जानती, शुद्ध करती, सुंदर बनाती, आनंदित करती, शांत करती, मुक्त करती और निर्वाण की ओर बढ़ाती हो।”

बुद्ध ने आखिर में कहा, “हे गिलहरी, तुमने मुझे एक बड़ा उपदेश दिया है। तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपने काम में अपने धर्म, कला और दर्शन को प्रकट करती हो। तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपने काम में अपने शिक्षा, आनुभूति और आत्मज्ञान को विकसित करती हो। तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपने काम में अपने स्वच्छता, प्यार, सेवा और धन्यवाद को व्यक्त करती हो। तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपने काम में अपने सब कुछ को समझती, स्वीकारती, अपनाती और निभाती हो।”

बुद्ध ने गिलहरी की बातों को सुनकर अद्भुत आनंद अनुभव किया। उन्हें लगा, कि वह एक साधारण गिलहरी है, लेकिन उसके पास एक अलौकिक ज्ञान है। उन्हें लगा, कि वह एक अनजान गिलहरी है, लेकिन उसने उन्हें एक अमूल्य उपहार दिया है। उन्होंने गिलहरी से पूछा, “हे गिलहरी, तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपना कर्तव्य, अभ्यास और अवसर जानती हो, तो बताओ, तुम्हारा आत्मज्ञान कैसा है? तुमने मुझे यह बताया, कि तुम इस सरोवर को स्वच्छ, प्यार और सेवा करती हो, तो बताओ, तुम्हारा धर्म कैसा है? तुमने मुझे यह बताया, कि तुम इस सरोवर से उपयोग, शिक्षा, दर्शन और आनुभूति पाती हो, तो बताओ, तुम्हारा लक्ष्य क्या है?”

गिलहरी ने बुद्ध की बात सुनी, और उसने विनम्रता से कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें बता दूं, कि मेरा आत्मज्ञान यह है, कि मैं एक गिलहरी हूँ, और मुझे अपने आत्मा को जानने की कोई इच्छा नहीं है। मुझे पता है, कि मेरा आत्मा इस सरोवर का हिस्सा है, और मुझे इस सरोवर के साथ एकता का अनुभव होता है। मुझे पता है, कि मेरा आत्मा इस संसार का हिस्सा है, और मुझे इस संसार के साथ करुणा का अनुभव होता है। मुझे पता है, कि मेरा आत्मा इस ब्रह्मांड का हिस्सा है, और मुझे इस ब्रह्मांड के साथ आनंद का अनुभव होता है। मुझे पता है, कि मेरा आत्मा इस शून्यता का हिस्सा है, और मुझे इस शून्यता के साथ शांति का अनुभव होता है। मुझे पता है, कि मेरा आत्मा इस निर्वाण का हिस्सा है, और मुझे इस निर्वाण के साथ मुक्ति का अनुभव होता है। मैं इसे अपना आत्मज्ञान मानती हूँ, और इसे अपना आत्मसाक्षात्कार मानती हूँ।”

गिलहरी ने आगे कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें बता दूं, कि मेरा धर्म यह है, कि मैं इस सरोवर को अपना परिवार मानती हूँ, और मुझे इसके प्रति प्रेम और सम्मान है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी जीव हैं, वे मेरे भाई-बहन हैं, और मुझे उनके प्रति दया और सहानुभूति है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी जल है, वह मेरी माता है, और मुझे उसके प्रति आभार और विश्वास है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी पृथ्वी है, वह मेरी धरती है, और मुझे उसके प्रति श्रद्धा और सेवा है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी आकाश है, वह मेरा पिता है, और मुझे उसके प्रति आदर और अनुग्रह है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी आत्मा है, वह मेरा बुद्ध है, और मुझे उसके प्रति भक्ति और अनुसरण है। मैं इसे अपना धर्म मानती हूँ, और इसे अपना धर्मपाल मानती हूँ।”

गिलहरी ने फिर कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें बता दूं, कि मेरा लक्ष्य यह है, कि मैं इस सरोवर को अपना गुरु मानती हूँ, और मुझे इससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी घटनाएं होती हैं, वे मेरे लिए एक संदेश हैं, और मुझे उनसे बुद्धि और विवेक प्राप्त होता है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी नियम हैं, वे मेरे लिए एक मार्गदर्शन हैं, और मुझे उनसे शील और समाधि प्राप्त होता है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी सत्य है, वह मेरे लिए एक प्रेरणा है, और मुझे उससे करुणा और प्रज्ञा प्राप्त होता है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी सुंदरता है, वह मेरे लिए एक आनंद है, और मुझे उससे उपेक्षा और निरोध प्राप्त होता है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी शांति है, वह मेरे लिए एक मुक्ति है, और मुझे उससे शांति और निर्वाण प्राप्त होता है। मैं इसे अपना लक्ष्य मानती हूँ, और इसे अपना गुरुदक्षिणा मानती हूँ।”

बुद्ध ने गिलहरी की बातों को सुनकर अद्भुत आश्चर्य अनुभव किया। उन्हें लगा, कि वह एक साधारण गिलहरी है, लेकिन उसके पास एक अलौकिक आत्मज्ञान है। उन्हें लगा, कि वह एक अनजान गिलहरी है, लेकिन उसने उन्हें एक अमूल्य शिक्षा दी है। उन्होंने गिलहरी से पूछा, “हे गिलहरी, तुमने मुझे यह बताया, कि तुम अपना आत्मज्ञान, धर्म और लक्ष्य जानती हो, तो बताओ, तुम्हारा नाम क्या है? तुमने मुझे यह बताया, कि तुम इस सरोवर को अपना परिवार, गुरु और धर्मपाल मानती हो, तो बताओ, तुम्हारा गोत्र क्या है? तुमने मुझे यह बताया, कि तुम इस सरोवर से प्रेम, सेवा और गुरुदक्षिणा पाती हो, तो बताओ, तुम्हारा धन्यवाद कैसे है?”

गिलहरी ने बुद्ध की बात सुनी, और उसने विनम्रता से कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें बता दूं, कि मेरा नाम गिलहरी ही है, और मुझे अपने नाम से कोई असंतोष नहीं है। मुझे पता है, कि मेरा नाम मेरी पहचान नहीं है, बल्कि मेरा नाम मेरी उपाधि है। मुझे पता है, कि मेरा नाम मेरे आत्मा का नहीं है, बल्कि मेरा नाम मेरे शरीर का है। मुझे पता है, कि मेरा नाम मेरे लिए नहीं है, बल्कि मेरा नाम दूसरों के लिए है। मुझे पता है, कि मेरा नाम मेरे लिए कोई महत्व नहीं रखता है, बल्कि मेरा नाम मेरे लिए कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैं इसे अपना नाम मानती हूँ, और इसे अपना नाम भूल जाती हूँ।”

गिलहरी ने आगे कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें बता दूं, कि मेरा गोत्र यह है, कि मैं इस सरोवर का अंश हूँ, और मुझे इसके साथ एकता का अनुभव होता है। मुझे पता है, कि मेरा गोत्र मेरी जाति नहीं है, बल्कि मेरा गोत्र मेरी वंशजता है। मुझे पता है, कि मेरा गोत्र मेरे आत्मा का नहीं है, बल्कि मेरा गोत्र मेरे शरीर का है। मुझे पता है, कि मेरा गोत्र मेरे लिए नहीं है, बल्कि मेरा गोत्र दूसरों के लिए है। मुझे पता है, कि मेरा गोत्र मेरे लिए कोई महत्व नहीं रखता है, बल्कि मेरा गोत्र मेरे लिए कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैं इसे अपना गोत्र मानती हूँ, और इसे अपना गोत्र भूल जाती हूँ।”

गिलहरी ने फिर कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें बता दूं, कि मेरा धन्यवाद यह है, कि मैं इस सरोवर को अपना गुरुदेव मानती हूँ, और मुझे इससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी ज्ञान है, वह मेरे लिए एक उपदेश है, और मुझे उससे बुद्धि और विवेक प्राप्त होता है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी धर्म है, वह मेरे लिए एक मार्गदर्शन है, और मुझे उससे शील और समाधि प्राप्त होता है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी सत्य है, वह मेरे लिए एक प्रेरणा है, और मुझे उससे करुणा और प्रज्ञा प्राप्त होता है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी सुंदरता है, वह मेरे लिए एक आनंद है, और मुझे उससे उपेक्षा और निरोध प्राप्त होता है। मुझे पता है, कि इस सरोवर में जो भी शांति है, वह मेरे लिए एक मुक्ति है, और मुझे उससे शांति और निर्वाण प्राप्त होता है। मैं इसे अपना धन्यवाद मानती हूँ, और इसे अपना गुरुदेव मानती हूँ।”

बुद्ध ने गिलहरी की बातों को सुनकर अद्भुत आनंद अनुभव किया। उन्हें लगा, कि वह एक साधारण गिलहरी है, लेकिन उसके पास एक अलौकिक आत्मज्ञान, धर्म और लक्ष्य है। उन्हें लगा, कि वह एक अनजान गिलहरी है, लेकिन उसने उन्हें एक अमूल्य शिक्षा, उपहार और धन्यवाद दिया है। उन्होंने गिलहरी को अपने पास बुलाया, और उसे अपना आशीर्वाद दिया। उन्होंने गिलहरी को अपना शिष्य बनाया, और उसे अपने साथ ले गए। उन्होंने गिलहरी को अपने धर्म का उपदेश दिया, और उसे अपने आत्मा की पहचान करने का मार्ग दिखाया। गिलहरी बुद्ध के उपदेशों का पालन करने लगी, और उन्होंने अपने जीवन को बुद्ध के उपदेशों के अनुसार जीना शुरू किया। वह एक गिलहरी से एक बौद्ध बन गई, और उसका नाम गिलहरी बुद्ध बन गया।

भगवान बुद्ध का ज्ञान और आनंद हमारे आत्मा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हमें अपने आत्मा को जानना, शुद्ध करना, सुंदर बनाना, और आनंदित करना चाहिए। हमें अपने आत्मा को बुद्ध के मार्ग पर ले जाना चाहिए, और उसे निर्वाण की ओर बढ़ाना चाहिए। हमें सब कुछ स्वीकार करना जरूरी नहीं है, बल्कि सब कुछ समझना जरूरी है।

इस कहानी का सार है, कि एक गिलहरी ने भगवान बुद्ध को अपने आत्मज्ञान, धर्म और लक्ष्य का उपदेश दिया, और उन्हें अपने आत्मा की पहचान करने का मार्ग दिखाया। भगवान बुद्ध ने उसकी बातों को सुनकर उसे अपना शिष्य बनाया, और उसे अपने साथ ले गए। गिलहरी ने भगवान बुद्ध के उपदेशों का पालन किया, और उसने अपने जीवन को बुद्ध के उपदेशों के अनुसार जीना शुरू किया।

आज मत बिगाडो- Buddhist Story in Hindi

आज मत बिगाडो- Buddhist Story in Hindi
आज मत बिगाडो- Buddhist Story in Hindi

एक बार की बात है, भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक गाँव में जा रहे थे। उन्होंने एक बूढ़े आदमी को देखा, जो अपने घर के सामने एक बड़े से ढेर को जला रहा था। बुद्ध ने उस बूढ़े आदमी से पूछा, “हे बूढ़े, तुम यह क्या कर रहे हो? तुम इतना सारा सामान क्यों जला रहे हो?” बूढ़ा आदमी ने बुद्ध को देखा, और उसने बदतमीजी से कहा, “हे बुद्ध, तुम्हें क्या फर्क पड़ता है? यह मेरा सामान है, और मुझे जो चाहिए, वह करूँगा। तुम अपना काम करो, और मुझे अपना काम करने दो।”

बुद्ध ने उस बूढ़े आदमी की बात सुनकर दया करते हुए कहा, “हे बूढ़े, तुम अपना सामान जला कर क्या प्राप्त करोगे? तुम तो अपना ही नुकसान कर रहे हो। तुम्हारा सामान तुम्हारे लिए उपयोगी हो सकता है, या तुम उसे किसी गरीब को दे सकते हो। तुम तो अपना ही पुण्य बिगाड़ रहे हो। तुम्हारा सामान तुम्हारे लिए धन है, या तुम उसे किसी धर्म के काम में लगा सकते हो। तुम तो अपना ही भाग्य बिगाड़ रहे हो। तुम्हारा सामान तुम्हारे लिए सुख है, या तुम उसे किसी दुःखी को दे सकते हो। तुम तो अपना ही आनंद बिगाड़ रहे हो। तुम्हारा सामान तुम्हारे लिए जीवन है, या तुम उसे किसी मृत्यु को तालने में मदद कर सकते हो। तुम तो अपना ही जीवन बिगाड़ रहे हो।”

बूढ़ा आदमी ने बुद्ध की बात सुनकर हंसते हुए कहा, “हे बुद्ध, तुम बहुत ही मूर्ख हो। तुम्हें कुछ भी नहीं पता है। यह मेरा सामान नहीं है, बल्कि यह मेरे पिता का सामान है। मेरे पिता ने मुझे इस सामान का वारिस बनाया है, और मुझे इसका उपयोग करने का अधिकार है। मुझे इस सामान से कोई प्यार नहीं है, बल्कि मुझे इस सामान से नफरत है। मुझे इस सामान की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि मुझे इस सामान से छुटकारा चाहिए। मुझे इस सामान का कोई उपयोग नहीं है, बल्कि मुझे इस सामान का नाश करना है।”

बुद्ध ने उस बूढ़े आदमी की बात सुनकर दुःख करते हुए कहा, “हे बूढ़े, तुम अपने पिता का सामान जला कर क्या प्राप्त करोगे? तुम तो अपने पिता का अपमान कर रहे हो। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का वारिस बनाया है, और तुम्हें इसका सम्मान करना चाहिए। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का उपयोग करने का अधिकार दिया है, और तुम्हें इसका लाभ उठाना चाहिए। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का उपहार दिया है, और तुम्हें इसका आभार दिखाना चाहिए। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का आशीर्वाद दिया है, और तुम्हें इसका अनुसरण करना चाहिए।”

बूढ़ा आदमी ने बुद्ध की बात सुनकर हंसते हुए कहा, “हे बुद्ध, तुम बहुत ही मूर्ख हो। तुम्हें कुछ भी नहीं पता है। यह मेरा सामान नहीं है, बल्कि यह मेरे पिता का सामान है। मेरे पिता ने मुझे इस सामान का वारिस बनाया है, और मुझे इसका उपयोग करने का अधिकार है। मुझे इस सामान से कोई प्यार नहीं है, बल्कि मुझे इस सामान से नफरत है। मुझे इस सामान की कोई जरूरत नहीं है, बल्कि मुझे इस सामान से छुटकारा चाहिए। मुझे इस सामान का कोई उपयोग नहीं है, बल्कि मुझे इस सामान का नाश करना है।”

बुद्ध ने उस बूढ़े आदमी की बात सुनकर दुःख करते हुए कहा, “हे बूढ़े, तुम अपने पिता का सामान जला कर क्या प्राप्त करोगे? तुम तो अपने पिता का अपमान कर रहे हो। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का वारिस बनाया है, और तुम्हें इसका सम्मान करना चाहिए। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का उपयोग करने का अधिकार दिया है, और तुम्हें इसका लाभ उठाना चाहिए। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का उपहार दिया है, और तुम्हें इसका आभार दिखाना चाहिए। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का आशीर्वाद दिया है, और तुम्हें इसका अनुसरण करना चाहिए।”

बूढ़ा आदमी ने बुद्ध की बात सुनकर गुस्से में कहा, “हे बुद्ध, तुम बहुत ही धोखेबाज हो। तुम्हें कुछ भी नहीं पता है। मेरे पिता ने मुझे इस सामान का वारिस नहीं बनाया है, बल्कि वह मुझे इस सामान का बोझ डाला है। मेरे पिता ने मुझे इस सामान का उपयोग करने का अधिकार नहीं दिया है, बल्कि वह मुझे इस सामान का बंधन लगाया है। मेरे पिता ने मुझे इस सामान का उपहार नहीं दिया है, बल्कि वह मुझे इस सामान का श्राप दिया है। मेरे पिता ने मुझे इस सामान का आशीर्वाद नहीं दिया है, बल्कि वह मुझे इस सामान का अभिशाप दिया है।”

बुद्ध ने उस बूढ़े आदमी की बात सुनकर दया करते हुए कहा, “हे बूढ़े, तुम अपने पिता का सामान जला कर क्या प्राप्त करोगे? तुम तो अपने पिता का दुःख बढ़ा रहे हो। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का बोझ नहीं डाला है, बल्कि वह तुम्हें इस सामान का सहारा देना चाहते थे। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का बंधन नहीं लगाया है, बल्कि वह तुम्हें इस सामान का स्वतंत्रता देना चाहते थे। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का श्राप नहीं दिया है, बल्कि वह तुम्हें इस सामान का वरदान देना चाहते थे। तुम्हारे पिता ने तुम्हें इस सामान का अभिशाप नहीं दिया है, बल्कि वह तुम्हें इस सामान का आशीर्वाद देना चाहते थे।”

बूढ़ा आदमी ने बुद्ध की बात सुनकर अपने आप को बहुत ही बेवकूफ और अज्ञानी महसूस किया। उसने समझा, कि वह अपने पिता के प्रति बहुत ही अनादरपूर्ण और अकृतज्ञ रहा है। उसने समझा, कि वह अपने पिता के सामान को जला कर अपने ही हाथों से अपना ही नाश कर रहा है। उसने समझा, कि वह अपने पिता के सामान को जला कर अपने ही हाथों से अपना ही दुःख बढ़ा रहा है। उसने अपनी गलती को माना, और बुद्ध से क्षमा मांगी।

बुद्ध ने उस बूढ़े आदमी की बात सुनकर उसे क्षमा कर दिया। उन्होंने उसे अपने पिता के सामान को बचाने का उपाय बताया। उन्होंने उसे अपने पिता के सामान को बेचने, दान करने, या उपयोग करने का सुझाव दिया। उन्होंने उसे अपने पिता के सामान को सम्मानित करने, आभारित होने, और आशीर्वादित होने का निर्देश दिया। उन्होंने उसे अपने पिता के सामान को अपना गुरु, धर्म, और लक्ष्य मानने का उपदेश दिया।

बूढ़ा आदमी ने बुद्ध के उपदेशों का पालन करने लगा, और उसने अपने जीवन को बुद्ध के उपदेशों के अनुसार जीना शुरू किया। उसने अपने पिता के सामान को बचाया, और उसका उचित उपयोग किया। उसने अपने पिता के सामान को सम्मानित किया, और उसका आभार दिखाया। उसने अपने पिता के सामान को आशीर्वादित किया, और उसका अनुसरण किया। उसने अपने पिता के सामान को अपना गुरु, धर्म, और लक्ष्य माना, और उससे बहुत कुछ सीखा।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है, कि हमें अपने पिता के सामान को जला कर नहीं, बल्कि उसका सम्मान करना चाहिए। हमें अपने पिता के सामान को नाश करने की नहीं, बल्कि उसका लाभ उठाने की चाहिए। हमें अपने पिता के सामान को श्राप मानने की नहीं, बल्कि उसका वरदान मानने की चाहिए। हमें अपने पिता के सामान को अपना बोझ नहीं, बल्कि अपना सहारा मानना चाहिए। हमें अपने पिता के सामान को अपना बंधन नहीं, बल्कि अपना स्वतंत्रता मानना चाहिए। हमें अपने पिता के सामान को अपना गुरु, धर्म, और लक्ष्य मानना चाहिए, और उससे बुद्ध के उपदेशों का अनुसरण करना चाहिए।

Buddhist Story in Hindi – धन का सही उपयोग

आज मत बिगाडो- Buddhist Story in Hindi
आज मत बिगाडो- Buddhist Story in Hindi

एक बार की बात है, भगवान बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक नगर में जा रहे थे। उन्होंने एक बहुत ही अमीर और गर्वी व्यापारी को देखा, जो अपने घोड़े पर बैठा था। व्यापारी ने भी बुद्ध को देखा, और उसने उन पर तिरस्कार करते हुए कहा, “हे बुद्ध, तुम तो एक भिखारी हो, जो लोगों से भिक्षा मांगकर जीते हो। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है, न धन, न यश, न आदर। तुम्हारा जीवन तो एक व्यर्थ है। तुम्हें तो शर्म आनी चाहिए।”

बुद्ध ने उस व्यापारी की बात सुनकर शांति से कहा, “हे व्यापारी, तुम तो एक अज्ञानी हो, जो लोगों को अपने धन से नापते हो। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है, न शांति, न अनंद, न ज्ञान। तुम्हारा धन तो एक अस्थिर है, जो कभी भी चला जा सकता है। तुम्हें तो जागरण करना चाहिए।”

व्यापारी ने बुद्ध की बात सुनकर हंसते हुए कहा, “हे बुद्ध, तुम तो एक मूर्ख हो, जो लोगों को अपने विचारों से भ्रमित करते हो। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है, न ताकत, न सामर्थ्य, न प्रभाव। तुम्हारा विचार तो एक अविश्वास है, जो कभी भी साबित नहीं हो सकता है। तुम्हें तो बुद्धि देना चाहिए।”

बुद्ध ने उस व्यापारी की बात सुनकर दया करते हुए कहा, “हे व्यापारी, तुम तो एक दुःखी हो, जो लोगों को अपने दुःख से संतुष्ट करते हो। तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है, न मित्र, न परिवार, न प्रेम। तुम्हारा दुःख तो एक अग्नि है, जो कभी भी तुम्हें जला सकता है। तुम्हें तो धर्म बताना चाहिए।”

व्यापारी ने बुद्ध की बात सुनकर अपने आप को बहुत ही गरीब और अकेला महसूस किया। उसने समझा, कि वह अपने धन के गर्व में अपने आत्मा को भूल गया है। उसने समझा, कि वह अपने धन के भरोसे अपने जीवन को बर्बाद कर रहा है। उसने समझा, कि वह अपने धन के चक्कर में अपने दुःख को बढ़ा रहा है। उसने अपनी गलती को माना, और बुद्ध से क्षमा मांगी।

बुद्ध ने उस व्यापारी की बात सुनकर उसे क्षमा कर दिया। उन्होंने उसे अपने धन को बचाने का उपाय बताया। उन्होंने उसे अपने धन को दान करने, न्याय करने, या धर्म करने का सुझाव दिया। उन्होंने उसे अपने धन को सम्मानित करने, शांत होने, और ज्ञानी होने का निर्देश दिया। उन्होंने उसे अपने धन को अपना गुरु, धर्म, और लक्ष्य मानने का उपदेश दिया।

व्यापारी ने बुद्ध के उपदेशों का पालन करने लगा, और उसने अपने जीवन को बुद्ध के उपदेशों के अनुसार जीना शुरू किया। उसने अपने धन को बचाया, और उसका उचित उपयोग किया। उसने अपने धन को सम्मानित किया, और उसका शांति पाया

व्यापारी ने अपने धन को बचाया, और उसका उचित उपयोग किया। उसने अपने धन से गरीबों की मदद की, अन्याय के खिलाफ लड़ा, और धर्म का पालन किया। उसने अपने धन को अपना साथी, शांति का साधन, और ज्ञान का स्रोत माना।

उसका जीवन बदल गया, और वह बहुत ही खुश और संतुष्ट हुआ। उसने अपने धन के साथ अपने मित्र, परिवार, और प्रेम को भी पाया। उसने अपने धन के साथ अपने दुःख, अज्ञान, और गर्व को भी छोड़ दिया।

वह बुद्ध का आभारी था, और उसने उनके उपदेशों को अपने जीवन का आधार बनाया। वह बुद्ध का अनुयायी बना, और उनके साथ उनके धर्म का प्रचार और प्रसार करने लगा। वह बुद्ध का शिष्य बना, और उनके साथ उनके धर्म का अनुभव और अभ्यास करने लगा।

वह बुद्ध का मित्र बना, और उनके साथ उनके धर्म का आनंद और शांति मानने लगा।

इस प्रकार, वह व्यापारी एक बुद्धिमान, धर्मात्मा, और सुखी व्यक्ति बन गया।

यह कहानी हमें यह सिखाती है, कि धन का सही उपयोग करने से हम अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं। धन का गलत उपयोग करने से हम अपने जीवन को बर्बाद कर देते हैं। धन का उपयोग करने का तरीका हमारे विचारों, भावनाओं, और कर्मों पर निर्भर करता है।

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