मुंशी प्रेमचंद (धनपत राय श्रीवास्तव) केवल एक कथाकार या उपन्यासकार नहीं थे; वे भारत की आत्मा, देहात के पसीने और आम भारतीय के स्वाभिमान की जीवंत आवाज़ थे। अभावों, भुखमरी और पारिवारिक संकटों के जिस चक्रव्यूह में साधारण इंसान टूटकर बिखर जाता है, उसी कड़वी ज़मीन पर खड़े होकर प्रेमचंद ने ‘गोदान’, ‘गबन’, ‘कफ़न’ और ‘ईदगाह’ जैसी कालजयी रचनाएं रच डालीं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि कलम की स्याही जब तक आंसू और पसीने में न भीगे, तब तक वह समाज की तकदीर नहीं बदल सकती।
हिंदी साहित्य के आकाश में जब भी सबसे दीप्तिमान नक्षत्र की खोज की जाएगी, मुंशी प्रेमचंद का नाम सबसे शीर्ष पर चमकता मिलेगा।
लेकिन यह चमक किसी चांदी के चम्मच या राजसी आश्रय से पैदा नहीं हुई थी। यह चमक उस तपस्या से निकली थी जहाँ फटे जूते पहनकर मीलों पैदल चलना पड़ता था, जहाँ सर्दियों में गर्म कोट बेचकर पेट की आग बुझानी पड़ती थी, और जहाँ अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा अपनी पहली ही किताब 'सोज़े-वतन' को ज़ब्त कर जलते हुए अपनी आँखों से देखना पड़ता था।
एक नज़र में: मुंशी प्रेमचंद का जीवन कालक्रम
| वर्ष | महत्वपूर्ण जीवन घटना | साहित्य व समाज पर ऐतिहासिक प्रभाव |
|---|---|---|
| 31 जुलाई 1880 | वाराणसी के निकट लमही गाँव में जन्म | बचपन का नाम धनपत राय, चाचा ने 'नवाब राय' नाम दिया |
| 1888–1895 | माता व पिता का देहावसान | 15 वर्ष की आयु में अनाथ, सौतेली माँ और छोटे भाई-बहनों का संपूर्ण भार कंधों पर |
| 1898 | ट्यूशन पढ़ाकर मैट्रिक पास किया | एक वकील के घर पांच रुपये महीने की ट्यूशन और अस्तबल में रात गुजारने का दौर |
| 1908 | प्रथम कहानी संग्रह 'सोज़े-वतन' प्रकाशित | अंग्रेजी हुकूमत द्वारा राजद्रोह का आरोप, प्रतियां जब्त कर सार्वजनिक रूप से जलाई गईं |
| 1910 | 'प्रेमचंद' छद्म नाम से लेखन का संकल्प | अंग्रेज़ों की नज़र से बचने के लिए ज़माना के संपादक दया नारायण निगम के सुझाव पर नाम बदला |
| 1921 | महात्मा गांधी के आह्वान पर सरकारी नौकरी से इस्तीफा | डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स के सुरक्षित पद को लात मारकर असहयोग आंदोलन में कूदे |
| 1930 | प्रसिद्ध पत्रिका 'हंस' और 'जागरण' का प्रकाशन | भारतीय लेखकों और प्रगतिशील सोच को मंच देने के लिए जीवन भर आर्थिक घाटा उठाया |
| 1934 | बॉम्बे सिनेमा (अजंता सिनेटोन) में पटकथा लेखन | 8000 रुपये सालाना के अनुबंध को स्वाभिमान की खातिर एक ही साल में ठोकर मारकर बनारस लौटे |
| 1936 | महाकाव्यात्मक उपन्यास 'गोदान' का प्रकाशन | भारतीय कृषक जीवन का अमर दस्तावेज़ रचा; प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अध्यक्ष बने |
| 8 अक्टूबर 1936 | साहित्य साधना करते हुए बनारस में महाप्रयाण | अधूरा उपन्यास 'मंगलसूत्र' पीछे छूटा, जिसे बाद में उनके पुत्र अमृत राय ने पूरा किया |
प्रेरक प्रसंग 1: जब किताबें और गर्म कोट बेचकर खानी पड़ी थी रोटी
मुंशी प्रेमचंद का विद्यार्थी जीवन किसी भयावह अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। जब वे गोरखपुर और बनारस में पढ़ रहे थे, तब पिता के आकस्मिक निधन के बाद घर में दाने-दाने की लाचारी थी। प्रेमचंद के पास पहनने के लिए ढंग के कपड़े नहीं थे और पैरों में फटे हुए जूते थे।
एक बार सर्दियों के मौसम में उनके पास खाने को एक पाई तक नहीं थी। दो दिनों से पेट में अन्न का एक दाना नहीं गया था। वे बनारस की सड़कों पर एक पुरानी किताब बेचने निकले ताकि कुछ पैसे मिल सकें। एक पुस्तक विक्रेता ने उनकी मजबूरी भांपकर उस अनमोल पुस्तक के बदले कौड़ियों के भाव पैसे दिए।
प्रेमचंद ने बाद में अपनी आत्मकथात्मक स्मृतियों में लिखा था:
"पाँव में जूते न थे, बदन पर फटे कपड़े थे। इम्तहान सिर पर था, और मैं स्कूल से पाँच मील दूर एक वकील साहब के अस्तबल में रहकर उनके लड़के को पढ़ाता था, जिसके बदले मुझे पाँच रुपये महीना मिलते थे। उन पाँच रुपयों में से तीन रुपये घर माँ को भेजता था और दो रुपये में अपना महीना काटता था। कई बार शाम को चने खाकर पानी पी लेता और सो जाता था।"
एक बार जब अत्यधिक ठंड में भूख असहनीय हो गई, तो प्रेमचंद ने अपना इकलौता पुराना ऊनी कोट बेच डाला। कोट बेचकर उन्होंने एक रुपया पाया, जिसमें से आठ आने घर भेजे और बाकी पैसों से कुछ सेर चना और गुड़ खरीदकर हफ्ते भर गुजारा किया।
जिस इंसान ने इस तरह की विकट कंगाली में साहित्य सृजन का स्वप्न देखा हो, उसके सामने दुनिया की कोई भी चुनौती टिक नहीं सकती थी।
प्रेरक प्रसंग 2: सिनेमा के लाखों रुपये ठुकराकर स्वाभिमान के साथ बनारस लौटना
1934 में जब 'हंस' और 'सरस्वती प्रेस' के कर्जों ने प्रेमचंद को चारों तरफ से घेर लिया, तब बॉम्बे के प्रसिद्ध फिल्म निर्माता 'अजंता सिनेटोन' के सेठ मोहन भवनानी ने उन्हें 8,000 रुपये सालाना के आकर्षक वेतन पर पटकथा लेखक के रूप में अनुबंधित किया। उस ज़माने में 8,000 रुपये एक बहुत बड़ी रकम थी, जिससे उनके सारे कर्ज़ चुटकियों में उतर सकते थे।
प्रेमचंद बंबई पहुँचे और उन्होंने 'मिल मज़दूर' फिल्म की कहानी लिखी। फिल्म मजदूरों के हकों, उनकी पीड़ा और पूंजीपतियों के शोषण पर आधारित थी।
लेकिन फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों ने व्यावसायिक मुनाफे और सस्ते मनोरंजन के लिए कहानी में फूहड़ प्रसंग, अस्वाभाविक नाच-गाना और मजदूरों के स्वाभिमान को गिराने वाले दृश्य जोड़ने का दबाव बनाया। निर्माताओं का कहना था:
"मुंशी जी! सिनेमा यथार्थ से नहीं, तमाशे से चलता है। जनता को सच नहीं, सपना दिखाइए।"
प्रेमचंद का स्वाभिमानी लेखक इस समझौते को बर्दाश्त नहीं कर सका। उन्होंने दो टूक जवाब दिया:
"मेरी कलम मजदूरों और किसानों के आंसुओं से लिखी गई है। मैं सिनेमा के चंद सिक्कों के लिए अपने समाज के यथार्थ और साहित्य की गरिमा की बलि नहीं चढ़ा सकता।"
प्रेमचंद ने अनुबंध की भारी-भरकम राशि और बॉम्बे के ग्लैमर को लात मार दी और तुरंत बनारस लौट आए। बनारस लौटकर उन्होंने पुनः तंगहाली को गले लगाया, लेकिन उसी तंगहाली की कोख से उन्होंने विश्व साहित्य की अमूल्य धरोहर 'गोदान' लिखकर तैयार की।
यदि प्रेमचंद ने बंबई में समझौता कर लिया होता, तो शायद वे अमीर बन जाते, लेकिन भारत 'गोदान' के होरी और धनिया की अमर दास्तान से हमेशा के लिए वंचित रह जाता।
विशेष भाग: मुंशी प्रेमचंद के जीवन से सीखने वाली 10 बातें
- अभावों को कमजोरी नहीं, ताकत बनाना: प्रेमचंद ने अपनी गरीबी पर कभी विलाप नहीं किया, बल्कि उसी गरीबी को अपनी कलम की सबसे बड़ी धार बना दिया।
- स्वाभिमान से कभी समझौता न करना: चाहे ब्रिटिश हुकूमत का दबाव हो या बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री के लाखों रुपये, उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ कभी नहीं दबाई।
- कमज़ोर वर्ग के प्रति गहरी संवेदना: साहित्य वही सार्थक है जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की पीड़ा को स्वर दे सके।
- भाषा की सहजता और मिठास: प्रेमचंद ने कभी क्लिष्ट या कठिन भाषा का दिखावा नहीं किया; वे हिंदुस्तानी (हिंदी-उर्दू का सहज संगम) में लिखते थे जो सीधे दिल में उतरती थी।
- सुरक्षित नौकरी छोड़ राष्ट्रहित चुनना: गांधी जी के एक भाषण पर शिक्षा विभाग की पक्की सरकारी नौकरी से इस्तीफा देना उनके अद्वितीय देशप्रेम का प्रमाण है।
- विपरीत परिस्थितियों में भी सतत अनुशासन: बीमारी, कर्ज और प्रेस की समस्याओं के बावजूद वे प्रतिदिन नियम से लिखते थे।
- कुरीतियों पर प्रहार: विधवा विवाह, अनमेल विवाह, छुआछूत और दहेज जैसी कुप्रथाओं पर उन्होंने बेबाक प्रहार किया और स्वयं एक बाल-विधवा शिवरानी देवी से विवाह करके समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत किया।
- अहंकार से सर्वथा मुक्ति: इतने बड़े लेखक होने के बावजूद उनका रहन-सहन हमेशा एक साधारण देहाती किसान जैसा ही रहा। हरिशंकर परसाई का निबंध 'प्रेमचंद के फटे जूते' उनकी इसी सादगी का प्रमाण है।
- युवाओं को अवसर देना: 'हंस' पत्रिका के माध्यम से उन्होंने तत्कालीन सैकड़ों नए लेखकों को निखारा और मंच प्रदान किया।
- सत्य के प्रति अटूट निष्ठा: साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानव चेतना को जगाना और सत्य का उद्घाटन करना है।
मुंशी प्रेमचंद के 5 अमर विचार (Quotes to Live By)
"विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखाने वाला कोई विद्यालय आज तक नहीं खुला।"
"आत्मसम्मान की रक्षा हमारा सबसे पहला धर्म और सबसे पहला कर्तव्य है।"
"दौलत से आदमी को जो सम्मान मिलता है, वह उसका नहीं, उसकी दौलत का सम्मान होता है।"
"जिस साहित्य से हमारा सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, वह साहित्य कहलाने योग्य नहीं।"
"संसार के सारे नाते-रिश्ते स्वार्थ के हैं, लेकिन माँ-बाप का प्यार और मिट्टी की खुशबू निःस्वार्थ होती है।"
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न 1: मुंशी प्रेमचंद का वास्तविक नाम क्या था और उन्हें 'मुंशी' की उपाधि कैसे मिली?
उत्तर: मुंशी प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उर्दू में वे 'नवाब राय' के नाम से लिखते थे। 'हंस' पत्रिका में वे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के.एम. मुंशी) के साथ मिलकर संपादन करते थे। पत्र के कवर पर 'मुंशी, प्रेमचंद' छपता था, जिसके बाद पाठकों ने उन्हें आदरपूर्वक 'मुंशी प्रेमचंद' कहना शुरू कर दिया। इसके अलावा कायस्थ शिक्षकों को भी उस दौर में सम्मान से 'मुंशी जी' कहा जाता था।
प्रश्न 2: अंग्रेजों ने प्रेमचंद की किस पुस्तक पर प्रतिबंध लगाकर उसे जला दिया था?
उत्तर: वर्ष 1908 में प्रकाशित उनके प्रथम उर्दू कहानी संग्रह 'सोज़े-वतन' (राष्ट्र का विलाप) को हमीरपुर के अंग्रेज कलेक्टर ने जब्त कर लिया था। उस पर राजद्रोह का आरोप लगाते हुए उसकी सभी 500 प्रतियां सार्वजनिक रूप से आग के हवाले कर दी गई थीं और बिना इजाजत न लिखने का फरमान सुनाया गया था।
प्रश्न 3: प्रेमचंद का सबसे अंतिम और अधूरा उपन्यास कौन सा था?
उत्तर: प्रेमचंद का अंतिम पूर्ण उपन्यास 'गोदान' (1936) था, जबकि उनका अंतिम और अधूरा उपन्यास 'मंगलसूत्र' था, जिसे उनकी मृत्यु के बाद उनके सुपुत्र अमृत राय ने पूरा कर प्रकाशित कराया था।