धूप हो या छांव हो, तू चलता चल,
राह में गहरा घाव हो, तू चलता चल।गिरना ही तो नियति है हर मुसाफिर की कभी,
गिर के जो संभल गया, वही सिकंदर बना अभी।
मत पूछ दिशाओं से कि मंजिल कितनी दूर है,
तेरा हर बढ़ता कदम ही तेरी विजय का नूर है!
धूप हो या छांव हो, तू चलता चल,
राह में गहरा घाव हो, तू चलता चल।गिरना ही तो नियति है हर मुसाफिर की कभी,
गिर के जो संभल गया, वही सिकंदर बना अभी।
मत पूछ दिशाओं से कि मंजिल कितनी दूर है,
तेरा हर बढ़ता कदम ही तेरी विजय का नूर है!