राजा जनक और अष्टावक्र: बाहरी रूप नहीं ज्ञान की पूजा | Inner Wisdom Moral Story in Hindi

जब आठ अंगों से टेढ़े मुनि अष्टावक्र राजा जनक की राजसभा में पहुँचे, तो उनके विचित्र शरीर को देखकर सभा के सभी विद्वान जोर-जोर से हंसने लगे। अष्टावक्र भी जोर-जोर से ठहाका मारकर हंसने लगे।

राजा जनक ने विस्मित होकर पूछा, “मुनिवर! सभासद तो आपकी शारीरिक विकृति देखकर हंसे, लेकिन आप क्यों हंसे?”
अष्टावक्र ने कहा: “राजन! मैं तो समझा था कि आपकी सभा में ज्ञानी और तत्ववेत्ता बैठते हैं, लेकिन यहाँ आकर देखा कि यहाँ केवल चर्मकार (चमड़े के पारखी) बैठे हैं! जो केवल चमड़ी देखकर इंसान का मूल्य आंकते हैं, वे ज्ञानी कैसे हो सकते हैं?” राजा जनक तुरंत समझ गए और उनके चरणों में गिर पड़े।

💡 सीख: इंसान की महानता उसके चेहरे या कपड़ों से नहीं, बल्कि उसके विचारों और चरित्र की गहराई से आंकी जाती है।

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