राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित ‘रश्मिरथी’ की यह पंक्तियाँ हर युग में संकट से जूझते इंसान की धमनियों में नया रक्त भर देती हैं:
सच है, विपत्ति जब आती है,
कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते,
क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं,
कांटों में राह बनाते हैं।है कौन विघ्न ऐसा जग में,
टिक सके वीर नर के मग में?
खम ठोंक ठेलता है जब नर,
पर्वत के जाते पांव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है,
पत्थर पानी बन जाता है!