नैतिक शिक्षा पर छोटी कहानी

यह नैतिक शिक्षा पर छोटी कहानी एक आश्रम में हुई एक अद्वितीय प्रेरणादायक घटना है, जहां दो युवकों को गुरुजी ने दी गई कसौटी ने दिखाया कि हर क्रिया पर अंतरात्मा की नजर है। युवकों ने कसौटी के अनुसार कबूतर की कलाकृति को पूरा करने का प्रयास किया, परंतु गुरुजी की चुनौती ने उन्हें अद्वितीय शिक्षा दी कि सफलता में ध्यान और ईश्वर की दृष्टि महत्वपूर्ण हैं।

गुरुकृपा: कबूतर की कलाकृति और अंतरात्मा की दृष्टि-नैतिक शिक्षा पर छोटी कहानी

एक समय की बात है किसी जंगल में एक साधु महात्मा का आश्रम था। जंगल के बीचों बीच आश्रम बहुत ही रमणीय एवं मन को शांति प्रदान करने वाला था। साधु महात्मा उस आश्रम में अपने शिष्यों को विविध विषय आदि पर शिक्षा प्रदान किया करते थे। सभी विद्यार्थी उन साधु महात्मा की बहुत इज्जत करते थे एवं उन महात्मा की चर्चा दूर दूर के राज्यों में होती थी। एक दिन दो युवक उन महात्मा के पास आए और उनका शिष्य बनने की इच्छा व्यक्त की। युवक अच्छे कुल और परिवार से थे और वह दोनों भी उन महात्मा की चर्चा सुनकर उनसे शिक्षा प्राप्त करने हेतु आश्रम पहुंचे थे।

नैतिक शिक्षा पर छोटी कहानी

महात्मा ने सोचा कि इन्हें शिष्य के रूप में स्वीकार करने से पहले इनकी छोटी सी कसौटी की जाए और उन्होंने उन दोनों से आश्रम के कमरे में रखे दो मिट्टी के कबूतर लाने को कहा। दोनों कबूतर बहुत ही सुन्दर थे तथा उन पर विशिष्ट प्रकार की कलाकृति की गई थी जिसे वे बेहद चमक रहे थे। महात्मा ने एक एक कबूतर दोनों युवकों के हाथ में दिए और उनसे कहा कि आपको आपके हाथ में दिए हुए कबूतर की गर्दन तोड़नी है। युवकों को लगा यह तो बहुत ही सरल काम है और इससे क्या शिक्षा हासिल होगी और इससे गुरुजी क्या कसौटी करेंगे?

किंतु गुरूजी ने उनके सामने एक शर्त रखी। महात्मा ने कहा कि आपको इन कबूतरों की गर्दन तभी तोड़नी है जब आपको कोई देख न रहा हो। स्मरण रहे यदि आपको इनकी गर्दन तोड़ते हुए किसी ने देख लिया तो आप परीक्षा में निष्फल हो जाओगे। जैसे ही आप गरदन तोड़ लो, मेरे पास आप चले आना। दोनों युवकों को लगा यह तो बहुत ही सीधा साधा और सरल काम है और दोनों आश्रम से बाहर की ओर चल पड़े। एक युवक आश्रम से थोड़ी दूर गया और उसने देखा कि यहां कोई देख ही नहीं रहा है।

नैतिक शिक्षा पर छोटी कहानी

दूर दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा है तो मैं गर्दन तोड़ देता हूं और गुरुजी से जाकर यह बात तुरंत कहता हूं। दूसरा युवक हाथ में उस कबूतर की कलाकृति को लिए दूर जंगल में चला गया। जब वह एक घने जंगल में पहुँच गया तो एक पेड़ के नीचे वह बैठा और कबूतर की गर्दन तोड़ने का फैसला किया। किंतु जैसे ही वह गरदन तोड़ने वाला था, उसकी नज़र उस पेड़ पर बैठी एक पक्षी पर पड़ी तो उसने सोचा कि अगर मैं यहां गर्दन तोड़ दूंगा तो यह पक्षी मुझे देख रहा है।

नैतिक शिक्षा पर छोटी कहानी

मुझे कोई और तरीका अपनाना होगा। कुछ विचार करने के बाद वह युवक पास की झाड़ियों में जाकर छुप गया। उसे लगा इन झाड़ियों में मुझे कोई नहीं देखेगा और मैं गुरूजी का दिया हुआ काम पूरा कर पाऊंगा। किंतु उसने देखा कि झाड़ियों में छोटे छोटे कीट पतंगे और मक्खियां थी तो वह भी उसे देख रही है।

यह सोचकर वह झाड़ियों में भी कबूतर की गर्दन नहीं तोड़ पाया। कुछ समय विचार करने के पश्चात उसे एक उपाय सूझा। उसने एक गड्ढा खोदा और उसगड्ढे में बैठ गया। अब उसे लगा कि मुझे कोई नहीं देख रहा है तो उसने उस कबूतर की कलाकृति की गरदन तोड़ने का फैसला लिया। किंतु उसे एक विचार आया कि अगर मैं इस कलाकृति की गर्दन तोड़ दूंगा तो इस कलाकृति में जो आंखें बनी है, वह मुझे देख रही है।

और यही सोचकर उसने उस कलाकृति पर एक कपड़ा डाल दिया और जैसे ही वह उसकी गर्दन तोड़ने को हुआ, उसे ख्याल आया कि मेरी आंखें तो मुझे देख रही हैं। इस कबूतर की गरदन तोड़ते हुए तो उसने अपनी आंखें बंद कर ली। अब युवक को न ही कलाकृति की आंखें देख रही हैं, न उसकी खुद की आंखें उसे देख रही हैं। और वह जैसे ही गर्दन तोड़ने को हुआ, मानो उसके अंदर से आवाज उठी कि अरे मैं तो देख रहा हूं और वह आवाज उसके हिरदय की थी।

मैं तो देख रहा हूं। अब वह युवक पूर्णतः समझ गया कि गुरूजी की कसौटी किस शिक्षा की तरफ इशारा कर रही है। वह युवक उस कबूतर की कलाकृति को लेकर गुरूजी के पास पहुंचा और उनसे कहा क्षमा कीजिए गुरूजी, मैं आपकी दी हुई कसौटी पूर्ण नहीं कर पाया क्योंकि हर समय कोई न कोई मुझे देख ही रहा था। अंत में मुझे आभास हुआ कि अगर बाहरी दुनिया मुझे नहीं देख रही तो मेरे भीतर बैठी हुई अंतरात्मा तो मुझे हमेशा देख रही है। इसी कारणवश गुरूजी मैं आपकी कसौटी पूरी नहीं कर पाया। इस बात के लिए मैं आपसे क्षमाप्रार्थी हूँ। गुरूजी ने कहा, हे नवयुवक!

तुम इस कसौटी में असफल नहीं किन्तु पूर्णतः सफल हुए हो और यही शिक्षा इस कसौटी के माध्यम से मैं आप दोनों को देना चाहता था। हर एक मनुष्य को यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारी हर एक क्रिया और कर्म पर परमात्मा की नजर है। कोई भी कार्य। उस अपार शक्ति से छुपा हुआ नहीं है। इसलिए कोई भी कार्य अगर इस बात को ध्यान में रखकर किया जायेगा तो अनुचित कार्य करने से पहले हमारे कदम स्वयं रुक जाएंगे।

निष्कर्ष

इस कहानी से हमें यह सिखने को मिलता है कि हमारे कर्मों में सफलता के लिए हमें अपनी क्रियाओं को ईश्वर की दृष्टि में करना चाहिए। गुरुकृपा और आत्मा के साथ संवाद के माध्यम से हमें यह याद दिलाया जाता है कि सफलता वहां होती है जहां हम अपनी क्रियाओं को नीति, ध्यान, और सावधानी से करते हैं।

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