तीन फकीर: एक प्रेरणादायक कहानी

लियोन टॉल्स्टॉय की प्रेरणादायक कहानी बहुत लोकप्रिय है। पुरानी रूस में कहा जाता है कि तीन फकीर बहुत प्रसिद्ध थे। जब लोग चर्च में आना बंद कर देते थे, वे इतने प्रसिद्ध हो गए कि वहां का सबसे बड़ा पादरी उन तीनों फकीरों से बहुत नफरत करने लगा। लगी क्योंकि धीरे धीरे लोगों ने चर्च में आना ही बंद कर दिया था। चर्च से लोगों की भीड़ बिल्कुल गायब सी हो गई थी। अब सभी लोगों ने उन तीन फकीरों के पास ही जाना शुरू कर दिया था। वहां का प्रधान पादरी सोचता कि यह तीनों कौन हैं जो मेरे रहते संत बन गए।

तीन फकीर: एक प्रेरणादायक कहानी

क्योंकि ईसाइयत में एक प्रथा है कि जब तक चर्च किसी इंसान को मान्यता न दे दी तब तक वह संत नहीं बन सकता। पादरी बड़ा परेशान रहने लगा, क्योंकि लोगों में चर्च की लोकप्रियता दिनोंदिन कम होती जा रही थी। लेकिन एक दिन तो हद ही हो गई। पादरी पूरे दिन चर्च में बैठा रहा, लेकिन एक भी व्यक्ति चर्च नहीं आया। पादरी के क्रोध का ठिकाना न रहा। उसने निश्चय किया कि आज तो उन तीनों फकीरों की खैर नहीं।

आज तो मैं उन तीनों को सबक सिखाकर ही रहूंगा। वह अपनी पूरी पादरी भेषभूषा में तैयार हुआ। उसने सोने का ताज पहना। हाथ में प्रधान पादरी का प्रतीक वाला सोने का डंडा लिया और चल पड़ा उन तीनों से मिलने। वे तीनों एक बड़ी सी झील के उस पार रहा करते थे। पादरी एक नाव में बैठकर झील के उस पार पहुंचा। थोड़ा आगे चलने पर उसे एक बड़े से पेड़ के नीचे तीन सीधे साधे इंसान बैठे हुए दिखाई दिए। वे तीनों पालथी मारकर चुपचाप उस पेड़ के नीचे बैठे हुए थे।

पादरी ने उनके पास जाकर कहा, क्या तुम तीनों प्रसिद्ध संत हो, जिनके कारण लोगों ने मेरे चर्च में आना बंद कर दिया है? उन तीनों ने कहा, संत अरे नहीं नहीं, हम किस बात के संत हैं। हम संत बनने के लायक नहीं हैं। यह तो यहां के लोग कहते हैं कि हम तीनों संत हैं। पता नहीं किसने यह झूठी अफवाह फैला दी। जिसे सुनकर लोगों की भीड़ यहां आती है। हम तो रोज ही इन्हें मना करते हैं कि यहां मत आया करो, लेकिन हम जितना मना करते हैं, भीड़ उतनी ही बढ़ती जा रही है।

हम इस भीड़ से परेशान हो चुके हैं। यह भीड़ भाड़ हमें रुकती नहीं। हम तो एकांत में ही रहना चाहते हैं। अच्छा हुआ आप आ गई। अब आप ही बचाइए हमें इस भीड़ से। यह सुन वह पादरी तो खुशी से फूला न समाया। सोचने लगा, यह तो बड़े ही भोले लोग निकले। खटिया खड़ी कर दूंगा इन तीनों की। आज तो इन तीनों को लाइन में लगाकर ही जाऊंगा। पादरी ने पूछा। लेकिन तुम तीनों करते क्या हो?

उन्होंने कहा, कुछ नहीं। बस इस पेड़ के नीचे बैठकर ईश्वर की प्रार्थना करते हैं। पादरी ने पूछा, बाइबल कहां हैं? उन तीनों ने अपना सिर नीचे झुका लिया। पादरी ने पूछा, क्या हुआ? उन्होंने कहा, अब क्या बताएं आपसे? हम तीनों ही अनपढ़ हैं। हमें पढ़ना नहीं आता। बाइबल रखकर भी क्या करेंगे? यह सुनकर तो वह पादरी और भी खुश हुआ। सोचने लगा, अनपढ़ हैं, फिर भी इतने सारे लोगों को बेवकूफ बना रखा है।

इनकी तो मैं मटियामेट कर डालूँगा। पूरे शहर के सामने इनकी बेइज्जती करूंगा। पादरी ने पूछा, फिर तुम लोग प्रार्थना कैसे करते हो? चर्च की प्रार्थना तो तुम्हें याद होगी ना। यह सुन उन तीनों ने फिर से अपना सिर नीचे झुका लिया। पादरी ने पूछा, अब क्या हुआ? तुम लोगों ने फिर से अपना सिर नीचे क्यों झुका लिया? उन्होंने कहा, क्या बताएं, बड़ी लज्जा आ रही आपसे बताते हुए कि हमें प्रार्थना भी नहीं आती। पादरी ने आश्चर्य से कहा, क्या तुम्हें प्रार्थना भी नहीं आती? उन तीनों ने नाम अपना सिर हिला दिया। पादरी ने कहा, फिर तुम तीनों प्रार्थना करते कैसे हो?

उन्होंने कहा, आपके चर्च की प्रार्थना तो बड़ी लंबी चौड़ी है। हम अनपढ़ गवाहों को याद ही न हो पाई और फिर गलत पढ़ने का कोई मतलब ही नहीं है। इसलिए बहुत सोचने के बाद बहुत गणित भिड़ाने के बाद हमने अपनी खुद की एक प्रार्थना बना ली। यह सुन पादरी जोर से चिल्लाया, क्या तुमने अपनी खुद की प्रार्थना बना ली? प्रार्थना तो सर्वमान्य होती है।

शास्त्रों में लिखी होती है। हजारों हजारों साल पुरानी होती है। जीसस को तो प्रार्थना खुद परमात्मा ने सिखाई थी, लेकिन तुम लोगों ने अपनी खुद की प्रार्थना बना ली। उन्होंने कहा, हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। हमें माफ करें। हम अनपढ़ गवार इंसान हैं। हमें कुछ नहीं पता। अब आप हमें जो प्रार्थना सिखाएंगे, हम वही प्रार्थना आज से करेंगे। हम आपके पैर पड़ते हैं। हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई। हमें क्षमा करें और आप हमें अपनी वाली प्रार्थना सिखाएं।

लेकिन पादरी के मन में भी जिज्ञासा जागी कि देखूं तो उन्होंने कौन सी प्रार्थना बनाई है। पादरी ने कहा, पहले तुम लोग मुझे अपनी प्रार्थना सुनाओ। उन्होंने कहा, नहीं महाराज, हम अनपढ़ों की प्रार्थना का कोई मतलब नहीं। आप हमें और शर्मिंदा न करें। आप हमें अपनी वाली प्रार्थना सिखाएं। लेकिन पादरी नहीं माना। इसलिए पादरी के बार बार कहने पर आखिर में वह अपनी प्रार्थना सुनाने के लिए राजी हो गए। उन्होंने कहा, हमने बहुत सोचा, बहुत विचार किया, लेकिन हमें कोई प्रार्थना न सूझी। फिर हमें याद आया कि ईसाइयत में तो भगवान के तीन रूपों को माना गया है। इसलिए हमने इसी पर अपनी प्रार्थना बना दी।

अगर आप हमारी प्रार्थना सुनेंगे तो हम पर हंसेंगे। इसके बाद वे तीनों चुप हो गए। पादरी ने कहा, अरे बताओ नहीं हसंगा में। उन्होंने कहा, भगवान के तीन रूप हैं, इसलिए हमने प्रार्थना बनाई। की हम भी दीन तुम्ही दीन हम पर कृपा करो। यह सुन तो वह गंभीर पादरी भी हंस पड़ा। बोला जिन्दगी में बहुत प्रार्थनाएं सुनी पर ऐसी प्रार्थना कभी न सुनी। वह मन ही मन सोचने लगा, बड़े बेवकूफ लोग हैं, आज तू इनकी अक्ल ठिकाने लगा कर ही जाऊंगा। इन तीनों को मेरे पास चर्च में आना ही पड़ेगा। उन तीनों ने कहा आप हमारी छोड़िये, अपनी प्रार्थना सिखाइए। हम आज से वही करेंगे।

पादरी ने उन्हें चर्च की प्रार्थना सिखानी शुरू की। उन्होंने कहा, एक बार और पादरी ने फिर सुनाई। उन्होंने कहा, एक बार और पादरी ने तीसरी बार सुनाई। उन्होंने कहा, एक बार और कहीं भूल न जाएं। पादरी ने फिर सुनाई। उन्होंने कहा, एक आखरी बार। और पादरी ने कहा, घबराओ मत, कभी कभी चर्च भी आया करो। धीरे धीरे तुम लोगों की जिंदगी सुधरने लगेगी और अगर रोज आओगे तो यह प्रार्थना भी सीख जाओगे। उन्होंने कहा, जी जैसी आपकी आज्ञा।

पादरी बड़ा खुश हुआ। उसने कहा, तुम लोग डरना मत, चर्चा हो। मैं तुम्हें माफ कर दूंगा और लोगों से भी माफ करवा दूंगा। उन्होंने कहा, आपका बहुत बहुत धन्यवाद। आप बड़े महान इंसान हैं। पादरी ने सोचा चलो एक झंझट छूटी। इन मूर्खों को तो लाइन पर ले आया हूं। वह अपनी नाव पर बैठकर वापस जाने लगा।

नाव अभी झील के बीचों बीच पहुंची ही थी कि पीछे से कुछ लोगों के चिल्लाने की आवाज आई। पादरी और माजी ने पीछे मुड़कर देखा तो उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। वे तीनों पादरी को पुकारते हुए झील के पानी पर दौड़ते हुए चली आ रही थी। वे तीनों पानी पर ऐसे दौड़ रही थी मानो कोई जमीन पर दौड़ रहा हो। यह देखकर तो पादरी के हाथ से वह सोने का डंडा छूटकर वहीं नाव पर गिर गया।

यह चमत्कार तो आज तक केवल जीसस ने ही करके दिखाया था। वे तीनों भागते हुए नाव के किनारे आकर खड़े हो गए और पादरी से कहने लगे, आप वह प्रार्थना हमें एक बार और सुना दी। हम उसे भूल रहे हैं। वह कहता है ऐसे शुरू होती हैं। यह कहता है ऐसे शुरू होती है। मैं कहता हूं ऐसे शुरू होती हैं। हम तीनों में बहस शुरू हो चुकी है। अब हम बहस करें या प्रार्थना करें।

इसलिए आप हमें वह प्रार्थना एक बार और सुना दी। पादरी ने तो झुककर उनके पैर ही पकड़ लिए और कहने लगा, अब तक जो भी बताया है, जो कुछ भी कहा है, सब कुछ भूल जाओ। तुम्हारी प्रार्थना जीती और मेरी हारी। तुम्हारी प्रार्थना ही श्रेष्ठ है, श्रेष्ठ है, क्योंकि वह सुन ली गई है। और सच तो यह है कि अब से मैं भी तुम्हारी वाली ही प्रार्थना करूंगा। गलती तो मुझसे हुई है जो मैंने तुम्हारी प्रार्थना को कम समझा। जबकि कमी तो मेरी श्रद्धा, मेरी आस्था में थी।

कमजोर तो मेरी प्रार्थना थी। इसलिए आप लोग मुझे क्षमा करें, बड़ा उपकार होगा। वे तीनों फकीर बोलते रहे कि आप एक बार हमें अपनी वाली प्रार्थना और सुना दी। लेकिन वह पादरी चुपचाप अपना सिर नीचे चुकायी वहां से चला गया।

लियो टॉल्स्टॉय की यह कहानी हमें सिखाती है कि यह जरूरी नहीं कि हमारे द्वारा की गई प्रार्थना शास्त्रों से ही ली गई हो। वह बहुत प्रचीन ही होनी चाहिए। लाखों लाखों लोगों द्वारा मान्यता प्राप्त होनी चाहिए। अगर हमारी प्रार्थना सच्ची है, सच्चे मन से की गई है तो वह परमात्मा के द्वारा जरूर सुनी जाएगी। फिर चाहे वह दो शब्दों की साधारण सी ही प्रार्थना क्यों न हो। उन तीन साधुओं की कहानी से सीखने को तो हमें यही मिलता है कि हम चाहे कुछ भी करें, लेकिन उसे दिखावे के उद्देश्य न करें। हम जब भी किसी काम को करें तो हमारी पूरी आत्मा उस काम में उतर जानी चाहिए।

उस काम को पूरा समर्पण देना चाहिए। हम हर काम में सफल होंगे अगर हम इसी तल्लीनता से हर काम कर सकते हैं। जैसा कि उन तीन पुरोहितों के साथ हुआ था। उन्हें लगता था कि उनकी प्रार्थना उनकी आत्मा ने की थी, क्योंकि वे इतने समर्पित थे। फिर उनकी प्रार्थना इतनी सच्ची हो गई कि ईश्वर भी सुन नहीं सका।

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